Tuesday, November 13, 2012

पीयूष श्रीवास्तव की कविता.


पीयूष श्रीवास्तव इंटरटेंमेंट इंडस्ट्रीज से जुड़े है, साहित्य में नए है; हम उनका स्वागत करते है. प्रस्तुत है उनकी एक कविता.



चलते चलते थम जाने की आदतें 
उड़ते उड़ते गड़ जाने की चाहतें
बहते बहते सूख जाने की हसरतें
बनते बनते मिट जाने की कुव्वतें.

ये चंद निशानियाँ हैं 
ये चंद कुर्बानियाँ हैं 
जो मिटा के भी बना डाले
जो धूल में महका डाले
जो उजालों को झुका डाले
जो अंधेरों को उठा डाले

जो नाम से जुड़ते नहीं 
जो सलाम से जुड़ते नहीं
जो धुन में ही चलते हैं
हर वक्त रमे लगते हैं.

जो इंसान हैं मगर औरों से नहीं
जो भगवान हैं मगर औरों से नहीं.


Friday, November 9, 2012

विमल चंद्र पाण्डेय का उपन्यास : सातवीं किश्त



(दो हजार छह में बनारस में हुए बम विस्फोटों के बाद शुरू हुए इस उपन्यास ने विमल के अनुसार उनकी हीलाहवाली की वजह से छह साल का समय ले लिया. लेकिन मेरे हिसाब से छह साल के अंदर इस उपन्यास ने मानवता के लंबे सफर, उसके पतन और उत्कर्ष के जिन पहुलओं को हमसाया किया है उसके लिए यह अवधि एक ठहराव भर नजर आती है. विमल की भाषा वैविध्य और कहानीपन से हम परिचित है. इस उपन्यास में विमल ने जिस बेचैन भाषा के माध्यम से कथ्य की पड़ताल की है वह समाज की अंतर्यात्रा से उपजी भाषा है. शुरू-शुरू में एकदम सहज, व्यंग्यात्मक और हास्ययुक्त भाषा और कुछ किशोरों के जीवन के खिलंदड़े चित्रण के साथ चलता सफ़र बाद में धीरे-धीरे उसी तरह डरावना और स्याह होता जाता है जैसे हमारी ज़िन्दगी. उपन्यास का नाम 'नादिरशाह के जूते' है लेकिन लेखक इसे लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है और यह बाद में बदला जा सकता है. हर शुक्रवार यह इस ब्लॉग पर किश्तवार प्रकाशित होता है..प्रस्तुत है सातवीं  किश्त ...अपनी बेबाक टिप्पणियों से अवगत कराएँ ..-मोडरेटर)



12.

ग्रुप के मुख्य सदस्य राजू और रिंकू के रोल मॉडल धीरूभाई अम्बानी और रितिक रोशन थे जबकि आनंद और सुनील शाहरूख खान और अमिताभ बच्चन के मुरीद थे। ग्रुप के अस्थायी सदस्य टुन्नू और अनुज गदाई की को हीरो की जगह हीरोइनें पसंद थीं और वे दोनों आश्चर्य करते थे कि लड़कों की पसंद लड़के कैसे हो सकते हैं। इस पर स्थायी सदस्यों का कहना था कि हमें अपने रोल मॉडल सावधानी से चुनने चाहिये क्योंकि अंतत: हम वैसा ही बनने की कोशिश करते हैं (साभार: शिव खेड़ा, जीत आपकी)।
इस बात को बाकी लोग चूतियापा कह कर टाल जाते थे।
            एक दिन कुछ अंतराल के बाद फिर से ग्रुप डिस्कशन हो रहा था। टॉपिक बहुत सरल था ´रिज़र्वेशन-गुड ऑर बैड फॉर सोसायटी´, मगर थोड़ी देर बाद पाया गया कि चर्चा कहीं की कहीं मुड़ गयी है। आनंद और सुनील का ग्रुप आरक्षण के विपक्ष में था और राजू और रिंकू का पक्ष में। कुछ देर बाद आवाज़ें तेज़ हो गयी थीं और बातों की मस्ती की जगह तल्खी ने ले ली थी।
´´यू वाण्ट टु से दैट यू आर सैटिस्फाइड विद द करेण्ट सिचुएशन ऑफ द कण्ट्री ?´´ यह रिंकू था जिसकी आवाज़ आश्चर्य से भरी हुयी थी।
´´आफकोर्स आय एम। एवरी नेशन हैज़ सम पॉज़िटिव एण्ड निगेटिव आस्पेक्ट्स बट वी शुड लुक फॉरवर्ड एण्ड ट्राय टु सी दैट हाउ ऑवर कण्ट्री इज़ डेवलपिंग दीज डेज...।´´ आनंद ने दलील दी।
´´दी ग्रोथ...अं रेट इज इम्प्रूविंग....।´´ सुनील ने अचानक मार्के की बात कह दी और आनंद की आंखों में उसके लिये प्यार उतर आया जिस पर सुनील उत्साहित हो गया और उसे लगा कि दोस्तों का समर्थन और प्यार उसे लगातार मिले तो वह कभी न कभी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल सकता है।
´´व्हाट ग्रोथ रेट.....डू यू बिलीव इन द स्टेटमेण्ट ऑफ द प्राइम मिनिस्टर व्हेन ही सेज दैट ऑवर कण्ट्री इज गोइंग अहेड ऑफ द टाइम...। दे नेवर फोकस ऑन द रीयल प्रॉब्लम्स ऑफ द नेशन्स एण्ड....।´´ रिंकू ने तल्खी से बात काटी तो आनंद से रहा नहीं गया।
´´डेफिनेटली आई बिलीव दैट माइ कण्ट्री इज डेवलपिंग एण्ड व्हाट माइ प्राइम मिनिस्टर सेज इज राइट। बिकॉज ही इज माइ प्राइम मिनिस्टर एण्ड दिस इज माइ कण्ट्री। एण्ड इफ यू ऑल्सो बिलीव दिस इज योर कण्ट्री, यू शुड आल्सो बिलीव व्हाट अंवर लीडर्स एण्ड अवर कांस्टीट्यूशन सेज....।´´
´´व्हाट डू यू मीन बाय इफ आइ ऑल्सो बिलीव दिस इज माइ कण्ट्री....इज देयर एनी स.....स......सस्पिशन ?´´ रिंकू की आवाज़ थोड़ी सी लड़खड़ा गयी थी।

´´नो सस्पिशन इफ यू बिलीव....।´´ आनंद अपनी बात पर अडिग था। राजू ने प्रतिवाद किया।
´´आनंद यू आर जस्ट टेकिंग दिस डिस्कशन टू द अनोदर डायरेक्शन एण्ड यू आर टाकिंग शिट...।´´ राजू की आवाज़ में गुस्सा था।
´´व्हाय शिट....टिल व्हेन वी वुड बी अवायडिंग दीज इम्पोर्टेंट क्वेशचन्स....।´´ आनंद की आवाज़ तेज़ हो गयी और उसने समर्थन पाने के लिये अपने साथी की तरफ़ देखा। सुनील सारी बातें समझ चुका था और हतप्रभ था और इस चर्चा में भागीदारी करने के लिये अच्छे तर्क नहीं खोज पा रहा था। जब अच्छे तर्क उसे सूझ भी जाते तो उनका अनुवाद कठिन होता था।
´´यू आल आर फकिंग द लॉ....।´´ उसने कहा और झल्ला कर उठ खड़ा हुआ। आनंद ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो उसने झटका देकर छुड़ा लिया।
´´व्हेयर आर यू गोइंग ? गोइंग अवे इज नॉट द सॉल्यूशन।´´ आनंद ने कहा।
´´या...वी आर डिस्कसिंग अ सीरीयस इश्यू।´´ राजू ने कहा तो सुनील ने रिंकू के चेहरे की ओर देखा जो चुपचाप बैठा था और उसके चेहरे पर रोज़ से अलग भाव थे।
´´यू आर जस्ट फकिंग द लॉ।´´ सुनील ने तमतमायी आवाज़ में कहा।
´´व्हाट डू यू मीन बाइ फकिंग द लॉ.....वी आर नॉट एबल टु अंडरस्टैंड।´´ आनंद ने राजू को अपने साथ मिलाते हुये सुनील से भी तेज़ आवाज़ में प्रश्न पूछा और कमरे में तल्खी भरा सन्नाटा छा गया। सुनील का दिमाग विद्रोह कर बैठा।
´´भोसड़ी वालों तुम लोग कानून चोद रहे हो बिना मतलब का। इहां बइठे हो जीडी करने की एक दूसरे की गांड़ मारने ? हमको नहीं करना अंग्रेजी ठीक जाओ गांड़ मराओ।´´ सुनील ने अपनी बात समझाने के लिये उस भाशा का सहारा लिया जिसमें वह सबसे कम्फर्टेबल महसूस करता था और इसके लिये उसने अपनी ही शैली भी प्रयोग की। बोल कर उसने अपना बोझ हल्का किया और बालकनी में चला गया। एक बालकनी में कपड़े सुखाती एक नवयौवना पर वह फोकस करने वाला ही था कि कमरे से बुरी तरह से हंसने की आवाज़ें आने लगीं। उसने धीरे से गर्दन पीछे घुमायी। रिंकू, आनंद और राजू ज़मीन पर और चौकी पर लोट-लोट कर बुरी तरह हंस रहे थे। वह कमरे में आया तो हंसी की आवाज़ें और तेज़ हो गयीं।
´´बेटा आज चाय चूय कराओगे तुम बाकायदा....।´´ रिंकू ने हंसते हुये कहा तो उसके दिमाग में बत्ती जली।
´´साले ये तुम लोगों की चाल....?´´ उसकी उलझन भरी आवाज़ सुनकर हंसी की आवाज़ें और तेज़ हो गयीं।
´´मुझे चूतिया बनाना तय रहा होगा मगर वे डाइलॉग तो असली लग रहे थे। क्या डाइलॉग भी पहले से तय थे ?´´ उसने फाटक की ओर जाते हुये राजू से तब पूछा था जब आनंद और रिंकू थोड़ा आगे चले गये थे।
´´नहीं नहीं कुछ भी तय नहीं था ऐसा बस इतना की तुमको मूंड़ना है आज। बाकी सब तो होता चला गया....।´´ राजू ने कहा और चुप हो गया। सुनील भी चुपचाप चलने लगा। उसे चाय सिगरेट में पैसे खर्च होने का दुख नहीं हो रहा था। उसका मन बार-बार बहस में उठने वाले बिंदुओं की ओर चला जाता था।

13.

सभी दोस्तों के अथक प्रयास (घर वालों को बेवकूफ़ बना कर पैसा झटकने के) और अपनी सारी जमा पूंजी बटोर कर जो मोबाइल रिंकू ने पूरी मण्डली के साथ जाकर ख़रीदा था वह आवाज़ के साथ वीडियो की भी रिकॉर्डिंग करता था और उसमें इस छत से उस छत तक ज़ूम करने की भी सुविधा थी। यह मोबाइल दुनिया मुट्ठी में करने की सलाह देता था और प्रेमियों के लिये इसके पास एक से एक सुविधाएं थीं जिनमें से एक थी एकमुश्त कुछ रकम रिचार्ज के नाम पर स्वाहा कर देने पर अपने प्रिय से चौबीस घंटे मुफ़्त बातचीत। रिंकू और सविता छतों पर इशारेबाज़ी और कागज़ फेंकने के अलावा एकाध बार रास्ते में कुछ सेकेण्ड के लिये मिल पाये थे और ´आई लव यू´ कह देने के बाद जितनी बातें हो पायी थीं, उनमें यह मुख्य था कि बिना मोबाइल के बातें हो पाना और प्रेम परवान चढ़ना असंभव है। रिंकू ने चौबीस घंटे कॉल फ्री का फायदा उठा लिया था और उसकी दुनिया वाकई उसकी मुट्ठी में आ गयी थी।
    मोबाइल आ जाने से रिंकू की दिनचर्या पूरी तरह से बदल गयी थी। सुबह मोबाइल पर सविता की आवाज़ सुनने से होती और रात उसकी वर्चुअल बाहों में गुड नाइट के साथ। सविता को थोड़ी दिक्कत ज़रूर होती क्योंकि उसका मोबाइल घर का मोबाइल था और उसे हर बार बात करने के बाद कॉल रजिस्टर में जाकर रिसीव और मिस कॉल्स डिलीट करनी पड़ती थीं। बातें ऐसी होती थीं जिनमें आम तौर पर किसी तीसरे को कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। कभी-कभी दिलचस्पी वाली बातें होतीं तो आवाज़ अपने आप बहुत धीमी हो जाती, इतनी धीमी कि बगल वाले को चिंता होती कि जब मुझ तक आवाज़ नहीं पहुंच रही तो फोन के उस पार वाले इंसान के पास कैसे पहुंच रही होगी।
            राजू और सुनील जब रिंकू के कमरे पर पहुंचे तो वह रोज़ की तरह फ़ोन पर लगा था। दरवाज़े कर खटखट सुनकर उसने दरवाज़ा खोला और दोनों को चौकी पर बैठने का इशारा कर इधर उधर टहलता बातें करने लगा। राजू ने उसे नींबू थमाया तो उसने आंखों आंखों में अनुनय की कि चाय वे ही लोग चढ़ा दें। राजू मुस्कराया और चाय चढ़ा आया। सुनील ने चूय सुलगायी और कश खींचने लगा। रिंकू के हाथ बढ़ाने पर उसने कहा, ´´अरे गंदे लड़के, तुम सिगरेट मांग रहे हो ?´´ रिंकू सिगरेट शब्द सुनकर घबरा गया और बालकनी में निकल गया।
´´कुछ नहीं वो सुनील आया है न, वही कुछ मज़ाक कर रहा है।´´ दोनों दोस्त चौकी पर ओलर गये और बालकनी में चल रही प्रेम चर्चा का आनंद उठाते रहे।
´´अरे ऐसे ही....कुछ खास नहीं।´´
´´हां और क्या...।´´
´´चावल और सब्ज़ी।´´
´´चावल बनाने में आसान होता है न इसलिये। तुम क्या खायी हो आज ?´´
´´अरे वाह मस्त।´´
´´कौन सोनिया ?´´
इसके बाद रिंकू कुछ मिनटों तक सिर्फ़ हंसता रहा जिससे पता चला कि अगले छोर वाला व्यक्ति कोई मनोरंजक किस्सा सुना रहा है। राजू और सुनील को भी वह किस्सा सुनने की उत्सुकता हुयी। दोनों दो ओर से रिंकू के कान के पास कान सटाने की कोशिश करने लगे। रिंकू अलग होने की कोशिश करने लगा। इस छीना-झपटी में फोन हाथ से छूट कर नीचे गिर गया।
´´छिनरो के सुने न देबा त इहे होई...।´´ सुनील ने अपनी हथेली देखते हुये कहा जिस पर खरोंच आ गयी थी।
´´भोसड़ी के बकचोद हो क्या एकदम्मे ? देख रहे हो पर्सनल बात कर रहे हैं....।´´ रिंकू ने बात ख़त्म करते हुये फोन उठाया तो यह पाकर हैरान रह गया कि फोन अभी कटा नहीं था और उधर से हैलो हैलो की आवाज़ आ रही थी।
´´हां हैलो अरे यार वो फोन....।´´
´´अरे सुनो तो हम नहीं बोले हैं...अरे।´´ रिंकू के चेहरे पर मातम छा गया और वह चुपचाप आकर अंदर बैठ गया। तब तक राजू अंदर से चाय छान लाया था।
तीनों के हाथ में एक-एक गिलास थी और तीनों धीरे-धीरे सिप ले रहे थे।
´´अबे हुआ क्या ?´´ राजू ने धीरे से पूछा।
´´बोली आप कितनी गंदी गालियां देते हैं। हम बोले की सुनील ने गाली दी है लेकिन वह कही कि आपकी आवाज़ थी। उसको बनारस एकदम अच्छा नहीं लगता क्योंकि यहां लोग गालियां बहुत देते हैं। वह बोली कि आप तो बहुत गंदे हैं ‘भो’ वाली गाली भी देते हैं और फोन काट दी।´´
            राजू और सुनील को हंसवास लगी थी लेकिन रिंकू का मुंह देखकर वे चुप रहे और चाय पीते रहे।
´´अबे मान जाएगी एकाध दिन में नहीं तो छत्ते पर से एक ठो चाकलेट फेंक देना।´´ राजू ने आयडिया दिया।
´´आधा खा के फेंकना....।´´ सुनील से रहा नहीं गया और उसने बत्तीसी खोल दी।
´´भोसड़ी के बहुत हरामी हो तुम।´´ रिंकू ने उसकी ओर घृणा से देखा।
´´देखो रिंकू जी सही में भो वाली गाली दे रहे हैं।´´ सुनील ने राजू की ओर देखा तो वह भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया और दोनों बुक्का कहां होता है, यह जाने बिना उसे फाड़ कर हंसने लगे। दोनों की हंसी देख कर रिंकू भी हंस तो दिया लेकिन उसके मन के एक कोने में यह चिंता चल रही थी कि आखिर उसे मनाएगा कैसे।

Friday, November 2, 2012

विमल चंद्र पाण्डेय का उपन्यास : छठवीं किश्त





(दो हजार छह में बनारस में हुए बम विस्फोटों के बाद शुरू हुए इस उपन्यास ने विमल के अनुसार उनकी हीलाहवाली की वजह से छह साल का समय ले लिया. लेकिन मेरे हिसाब से छह साल के अंदर इस उपन्यास ने मानवता के लंबे सफर, उसके पतन और उत्कर्ष के जिन पहुलओं को हमसाया किया है उसके लिए यह अवधि एक ठहराव भर नजर आती है. विमल की भाषा वैविध्य और कहानीपन से हम परिचित है. इस उपन्यास में विमल ने जिस बेचैन भाषा के माध्यम से कथ्य की पड़ताल की है वह समाज की अंतर्यात्रा से उपजी भाषा है. शुरू-शुरू में एकदम सहज, व्यंग्यात्मक और हास्ययुक्त भाषा और कुछ किशोरों के जीवन के खिलंदड़े चित्रण के साथ चलता सफ़र बाद में धीरे-धीरे उसी तरह डरावना और स्याह होता जाता है जैसे हमारी ज़िन्दगी. उपन्यास का नाम 'नादिरशाह के जूते' है लेकिन लेखक इसे लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है और यह बाद में बदला जा सकता है. हर शुक्रवार यह इस ब्लॉग पर किश्तवार प्रकाशित होता है..प्रस्तुत है छठवीं  किश्त ...अपनी बेबाक टिप्पणियों से अवगत कराएँ ..-मोडरेटर)







10.

दुर्गापूजा की तैयारियों के बीच अंग्रेज़ी बोलने वाला कार्यक्रम कई दिन टल गया। किसी दिन कोई नहीं होता तो किसी दिन कोई। आखिर एक हफ्ते के बाद दिन में दृढ़ निश्चय कर चारों दोस्त रिंकू के कमरे पर शाम पांच बजे इकट्ठा हुये। राजू पहले से बैठा था और आनंद और सुनील सिगरेट और नींबू लेकर पहुंचे। रिंकू के चेहरे पर गौतम बुद्ध जैसी शांति थी और राजू के चेहरे पर रावण जैसी बेचैनी। माहौल में एक अजीब सी निष्कर्षता थी मानो अब किसी चीज़ पर बहस करने की कोई गुंजाइश नहीं। दो-दो के दो ग्रुप बनाये गये। राजू और रिंकू एक ओर और आनंद और सुनील एक ओर हुये, ग्रुप डिस्कशन का टॉपिक तय रहा- लव मैरिज वर्सेज़ अरेंज मैरिज। रिंकू के ग्रुप ने ज़ाहिराना तौर पर लव मैरिज का टॉपिक लिया और सुनील के ग्रुप ने अरेंज मैरिज का। आनंद ने भूमिका बनायी और मॉडरेटर के तौर पर पहले रिंकू को बोलने का न्यौता दिया।
´´आय थिंक लव मैरिज इज बेटर बिकॉज यू नो योर लाइफ पार्टनर ऑलरेडी। यू नो हर वीकनेसेस एक स्ट्रेंथ विच हेल्प यू टु बिहैव अकार्डिंगली।´´ राजू ने सिर हिलाकर रिंकू की बात का समर्थन किया। आनंद ने अपनी भूमिका निभायी।
´´बट इफ योर पैरेंट्स आर नॉट रेडी फॉर योर लव मैरिज, डोंट यू थिंक इट्स नॉट ए गुड आयडिया टु डिसओबे योर पैरेंट्स ?´´
´´आय डोंट थिंक सो। दिस इज योर लाइफ एण्ड यू हैव द राइट टु चूज योर लाइफपार्टनर।´´ रिंकू।
´´ बट हाउ कुड यू नो दैट योर च्वायस इज़ राइट ?  डोण्ट यू थिंक यू कैन कमिट अ मिस्टेक इन सच अ बिग डिसीजन लाइक दिस ?´´ आनंद।
´´दिस कैन बी रिपीटेड इन द डिसीजन्स टेकेन बाय अवर पैरेण्ट्स टू। दे कैन ऑल्सो कमिट मिस्टेक। ऐट लीस्ट वी नो व्हाट वी आर डुइंग।´´ रिंकू।
´´ही इज़ राइट। वी कैन ऑल्सो चैलेंज द ओल्ड कास्ट सिस्टम इन लव मैरिज।´´ राजू ने बहुत देर तक एक तड़तड़ाता वाक्य अनुवाद किया और जड़ दिया।
´´या, वी कैन चैलंज द ऑर्थोडॉक्स रिलीजन एण्ड कास्ट मैचिंग ट्रेडिंशन थ्रू दिस वे।´´ रिंकू ने राजू के वाक्य में अपनी क्षमता के हिसाब से सुधार किया और राजू को समझ में आया कि रिंकू की वोकाबलरी काफी अच्छी हो गयी है।
´´व्हाट ऑर्थोडॉक्स...अवर कल्चर हैज अ मीनिंग एण्ड एवरीथिंग इन अवर कल्चर डज़ हैव अ मीनिंग। द रिलीजन एण्ड कास्ट सिस्टम इज़ अ वेरी इम्पोर्टेंट पार्ट इन द बैलेंस ऑफ अवर सोसायटी।´´ आनंद ने दलील दी। रिंकू के चेहरे पर अचानक ऐसे भाव आ गये जैसे उसे करंट लगा हो।
´´व्हाट ? आर यू जोकिंग ?  डू यू रियली बीलिव दैट दिस सिस्टम इज़ अ वेरी गुड पार्ट ऑफ द सोसायटी ?´´ रिंकू की आवाज़ में अचानक तुर्शी आ गयी।
´´ऑफकोर्स आय डू। आय बीलिव इन माय कल्चर एण्ड इट्स ट्रेडीशन ऑल्सो।´´ आनंद ने आत्मविश्वास के साथ कहा। ´´इजण्ट इट सुनील ?´´ उसने सुनील की रज़ामंदी लेनी चाही जो शुरू से अब तक सिर्फ़ मन में अनुवाद ही करता रहा था। जैसे ही वह एक उपयुक्त वाक्य का ठीक ठाक अनुवाद कर पाता, बहस आगे निकल जाती थी और वह झल्ला कर रह जाता था।
´´या या, आइ एम एग्री विद आनंद।´´ सुनील ने कहा और पता नहीं क्यों उसके माथे पर पसीना चुहचुहा आया।
´´आय अग्री विद आनंद।´´ आनंद ने उसका वाक्य सुधारा और वह तिलमिला गया कि उसका पहला वाक्य भी सही नहीं था। कमरे में थोड़ी देर के लिये दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनायी दी।
´´आय´म शॉक्ड....।´´ रिंकू ने थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़ी और उठकर बालकनी में टहलने लगा। राजू अपने ग्रुप के साथी का हालचाल लेने बालकंनी में गया और रिंकू के मूड खराब होने का कारण जानने की कोशिश की।
´´क्या हुआ बे, झांट क्यों जल गयी तुम्हारी ?´´
´´भोसड़ी का चूतिया है अनंदवा।´´ रिंकू ने गुस्से भरे स्वर में कहा और दूर पार्क में कॉलोनी के बच्चों को क्रिकेट खेलता देखने लगा जो क्रिकेट के साथ-साथ आसपास के छतों पर ताकाझांकी भी कर रहे थे और उन्हें कॉलोनी की जवान होती लड़कियों का अपूर्व समर्थन हासिल था।



11.
´भोजन करते वक़्त बोलना नहीं चाहिये’ और ´स्त्रियों का भोजन एकांत में होना चाहिये´, इन दोनों विषयों को मिला कर भोजन के दौरान अनु, मनु और सविता को एक संयुक्त व्याख्यान देने के बाद शुक्ला जी ने कुछ देर आराम किया और उसके बाद कॉलेज जाने की तैयारी करने लगे। पुत्रियों को भोजन करते हुये देखना उन्हें पता नहीं क्यों बड़ा अजीब सा लगता था। उन्होंने उन्हें कई बार समझाया कि लड़कियों को एकांत में खाना चाहिये पर लड़कियां कभी भी कहीं भी खाना लेकर बैठ जाती थीं और परिणामस्वरूप लेक्चर देने के आदती शुक्ला जी को भोजन का स्वाद पता ही नहीं चल पाता था। कई बार तो वह पूरे भोजन करने के दौरान ´खाते वक़्त बोलना नहीं चाहिये´  विषय पर व्याख्यान देते रहे थे।
            आराम करते हुये उनके मन में कुछ महीने पहले की वह घटना ताज़ा हो गयी जिसने उन्हें इस उम्र में भी शर्मिंदा कर दिया था। शुक्ला जी पूरी तरह से सात्विक आदमी थे और एक के बाद एक ताबड़तोड़ कई बेटियां पैदा होने की वजह से स्त्रियों के प्रति बहुत नरम हो गये थे। जब उनकी नरमाहट हद से ज़्यादा बढ़ जाती तो वह एकाध बार उन पुरानी गलियों में निकल जाते जहां उन्हें बनारस के एक लगभग लुप्त हो चुके स्वाद की थोड़ी सी झलक मिलती। शुक्ला जी के बचपन के मित्र अमरमणि तिवारी रेलवे में थे और बनारस में पोस्टेड थे। शुक्लाजी हर दूसरे महीने के पहले शनिवार को तिवारी जी के साथ दो दिन के लिये लखनऊ जाते थे। उनका लखनऊ बनारस से मात्र आधे घण्टे की दूरी पर था और गोदौलिया के एक बहुत भीतरी मुहल्ले टेढ़ीनीम में स्थित था। वहां वह तिवारी जी के साथ जम के पीते और चढ़ जाने के बाद इस बात पर बहुत खुश होते कि वह शराब के गुलाम नहीं हैं और उन्हें इसकी तलब नहीं सताती। वह सिर्फ़  दो महीने में एक बार पीते हैं। उस दिन शुक्ला जी अपने परम मित्र के साथ एक ऐसा नृत्य देखते जिसमें कई भारतीय शास्त्रीय नृत्यकलाओं के साथ पाश्चात्य नृत्यकलाओं की छौंक होती और नृत्यांगना का पूरा ध्यान अपने कुछ विशेष अंगों को अपने कदरदानों के सामने जाकर पूरी ताकत से हिलाने में होता था। आंइस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार शुक्ला जी को हर बार नृत्य की अवधि बहुत कम लगती और वह एक घंटे लगातार नृत्य देखने के बाद शुक्ला जी उस नृत्यांगना के साथ आयी मोटी महिला, जो खुद को नृत्यांगना का मैनेजर कहती थी और फि़ल्मी चित्रण के विपरीत पान नहीं खाती थी, से इस बात पर भिड़ जाते कि अभी और होना चाहिये, मज़ा नहीं आया।
            उन दिन जब शुक्ला जी और तिवारी जी दोनों ही एक पूरी बोतल खत्म करने के कगार पर थे, तिवारी जी ने नृत्यांगना के एक अंग को, जिसका उस दिन नृत्य में वह हर बार से अधिक और बहुत लाउड प्रयोग कर रही थी, पकड़ कर मसल दिया। नृत्यांगना गैरतमंद थी और इस तरह वह भले शुक्ला जी और तिवारी जी दोनों की सेवा करती थी, असमय और छीनाझपटी वाली स्टाइल में धरपकड़ से नाराज़ हो गयी और नाचने से मना कर दिया। नृत्यांगना की मैनेजर ने उन दोनों को दिया गया कमरा बंद कर दिया और उनका सामान बाहर सड़क पर फेंक दिया। दोनों मित्र अब रात गुज़ारने के लिये कुछ जुगत लगाते हुये कैण्ट की तरफ पैदल ही बढ़े जा रहे थे। रात के करीब तीन बजे थे और मलदहिया चौराहा बिल्कुल सुनसान था। अचानक उन्हें किसी गाड़ी की धीमी आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा यह एक पुलिस जीप थी जो मलदहिया चौराहे का चक्कर लगाने के बाद वहीं आसपास घूमने लगी। वे लोग अपनी जगह जड़ हो गये और अपने-अपने कुलदेवताओं को याद करने लगे। चौराहे के पास के एक छोटे कटरे की आड़ में दोनों मित्र खड़े हो गये और सोचने लगे कि आज अगर बच गये तो पूरी ज़िंदगी सत्तू खाकर और पत्नी की पूजा कर निकाल देंगे।
´´दुख की बात तो यह है कि वास्तव में तो हम लोग बहुते सीधे आदमी हैं शुक्लाजी। दू महीना में एक बार जीवन का आनंद लेने की कोसिस की अउर देखिये पुलिस पीछे पड़ी है।´´ तिवारी जी ने लड़खड़ाते शब्दों में कहा।
´´बिल्कुल सही कह रहे हैं तिवारी जी। गलत काम नहीं करना चाहिये इसीलिये न कहा जाता है भाई। बस आज बच जाएं महादेव जी...।´´ शुक्ला जी की आवाज़ भी लड़खड़ा रही थी।
´´जो भोसड़ी के रोज रंडी दारू करते हैं उनको कोई ख़तरा नहीं है अउर हम लोग देखिये इतने सरीफ आदमी होकर भी छिपे हैं हिंया। साले जीप से उतर के नहीं खोज रहे हैं नहीं तो हम लोग अब तक पकड़ा चुके होते।´´ तिवारी जी ने बाहर की ओर झांकते हुये कहा।
            शुक्लाजी ने भी धीरे से बाहर झांका। पुलिस की गाड़ी में हेडलाइट नहीं जली थी और न ही सायरन बज रहा था। चौराहे पर जली रोडलाइटों से पता चलता था कि यह पुलिस की गाड़ी है। गाड़ी में एक दारोगा और दो से तीन तक कांस्टेबल थे। वे लोग दुकानों और घरों के आसपास से जीप गुज़ार कर शायद किसी की तलाश कर रहे थे। सब कुछ तलाश करने के बाद जीप चौराहे पर थोड़ी देर के लिये बेआवाज़ रूकी। दो सिपाही बाहर निकले और जीप से कोई चीज़ बाहर गिरी। जीप रोशनी के दायरे से थोड़ी दूर थी इसलिये कुछ साफ दिखायी भी नहीं दिया और डर में सिर से पांव तक डूबे दोनों दोस्तों का दिमाग इस दृश्य पर ठहरा भी नहीं।
´´लगता है जा रहे हैं सब।´´ शुक्ला जी की दबी सी आवाज़ आयी तो तिवारी जी ने भी सिर निकाल कर देखा। उनका नशा अब तक पूरी तरह उतर चुका था और पुलिस की जीप इंग्लिशिया लाइन की तरफ जाती देख उनका दिमाग तेज़ गति से काम करने लगा।
´´चलिये जल्दी भागा जाय।´´ शुक्ला जी ने प्रस्ताव दिया।
´´रुकिये महाराज जल्दिआइये मत। पुलिस अब यहां से हम लोगों को खोजते हुये कैण्ट की तरफ गयी है। उस रंडी की औलाद ने उनको बता दिया होगा कि आपका घर कॉलोनी में है और मेरा भोजूबीर। वो लोग अब उधर ही तलाश करेंगे थोड़ी देर और हो सकता है कि एकाध हवलदार कैण्ट के आसपास छोड़ जायं हमारी तलाश करने के लिये।´´ तिवारी जी के शब्दों में जोश और व्यामकेश बख्शी वाली चतुराई थी जिसमें पुलिस को मूर्ख बनाने का उत्साह झलक रहा था।
´´तो का किया जाय ?´´ चिंतित शुक्लाजी ने पूछा।
´´कुछ देर यहीं इंतज़ार किया जाय। एकाध घण्टे बाद जब लगेगा कि सब ठीक है तो निकला जायेगा।´´
´´ठीक है।´´
            दोनों दोस्त दीवार की टेक लगा कर बैठ गये। मुश्किल से दस मिनट ही बीते होंगे कि पुलिस की गाड़ी का सायरन बजा, बहुज ज़ोर से। जीप ज़ोर से हॉर्न बजाती हुयी आयी और चौराहे पर पहुंचने से पहले ही दो फायर हुये। दोनों दोस्तों की आत्मा शरीर का साथ छोड़ने को अग्रसर हो गयी। शुक्ला जी के सामने अपनी प्यारी अनपढ़ लेकिन आज्ञाकारी पत्नी और बेटियां घूम गयीं। चक्कर आने से पहले उन्हें शेर सिंह का भी चेहरा दिखायी दिया था। तिवारी जी ने उन्हें संभाला। उनका दिमाग भय में लिपटे होने के बावजूद अब भी काम कर रहा था। उन्होंने बाहर देखा। पुलिस की जीप जहां पहले रूकी थी और जीप से कोई चीज़ बाहर गिरी थी वहां कई पुलिस वाले खड़े थे। जीप थोड़ी दूरी पर खड़ी थी और कुछ दुकानदार गोली की आवाज़ सुनकर नींद से जाग गये थे और मौके पर पहुंच गये थे। तिवारी जी सिर्फ़ एक कदम आगे बढ़े और जीप की हेडलाइट की रोशनी में दृश्य बिल्कुल साफ़ हो गया।

सामने एक युवक की लाश पड़ी थी।