Tuesday, October 7, 2014

प्रेम गली अति सांकरी, कहानियों में तो और भी..

विमल का यह आलेख हिंदी चेतना के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था. इस आलेख में विमल ने मंजुलिका पाण्डेय की कहानी " अति सूधो सनेह को..." के बहाने हिंदी के युवा कहानीकारों की प्रेम कहानियों को देखा हैं. जैसे विमल की कहानियों में एक खास किस्म की रोचकता हमें बाँधती है, कई चीजों के साथ इस आलेख में भी वो रोचकता है. 








(वर्ष २००० के बाद कुछ युवा कहानीकारों की प्रेम कहानियां)


(कृपया लेखक को लेखक-लेखिकाएं पढ़ें)

खालिस प्रेम कहानियों की उसी तरह कमी है जैसे जीवन में खालिस प्रेम की। प्रेम कहानियों के साथ अक्सर यह दिक्कत देखी गयी है कि वे प्रेम कहानियां होते हुये भी जीवन के किसी बड़े पक्ष को छूने की कोशिश करने लगती हैं. अच्छे लेखक इस बड़े पक्ष को साध लेते हैं और यह साधना कई बार ऐसा हो जाता है कि कहानी में पनप रहा एक मासूम सा खूबसूरत प्रेम छोटा पड़ जाता है और वह दूसरा पक्ष या दूसरा मुद्दा कहानी की मुख्य थीम बन जाता है। ऐसा होने के कई कारण होते हैं. जब लेखक इसे पूरी तरह जानते समझते कर रहा होता है तो वहां प्रेम एक टूल की तरह प्रयोग किया जाता है जहां जीवन से जुड़े किसी अन्य मुद्दे को उभारने और उसके महत्व को दिखाने के लिये इसका प्रयोग होता है। लेकिन कई बार लेखक को अपनी प्रेम कहानी पर विश्वास नहीं होता और वह इसके फलक को बड़ा बना देने की कोशिश करते हुये सायास इसमें कभी सांप्रदायिकता,जातिभेद, बेरोज़गारी या अपराध को लाता है या फिर किसी और समीचीन समस्या को इसमें पिरोने की कोशिश करता है। इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि ‘और भी गम हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’ वाली बात भी तो आखि़रकार सच ही है, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि ‘और गमों’ की बात भी मुहब्बत से चोट खाने के बाद ही कही जा रही है, यह गीत में स्पष्ट नाराज़गी से साफ़ ज़ाहिर है जहाँ सामने वाला पहली सी मुहब्बत देने की मनःस्थिति से दूर आ चुका है.
कहानी लिखना कोई तकनीकी काम नहीं है कि इसमें निश्चित नियम या फिर तय फ़ॉर्मूले हों, कई बार कथाकार इस को बखूबी साध लेता है और कहानी शानदार हो जाती है लेकिन समस्या तब होती है और अक्सर होती है कि कहानीकार इसे साधने में असमर्थ हो जाता है। युवा कथाकार कुणाल सिंह की बहुचर्चित कहानी है ‘रोमियो जूलियेट और अंधेरा’ जिसमें असम में व्याप्त हिंसा का चित्रण है। अनुभा नाम की असमिया लड़की और मनोज नाम के हिंदीभाषी लड़के के बीच यह प्रेम कहानी सुन्दर ढंग से आगे बढ़ती है कि तभी एक लहर आती है और यह प्रेम हिंदीविरोधी उप्रदव की भेंट चढ़ जाता है। कुणाल ने इस कहानी की भूमिका लिखी है जिसमें स्पष्ट है कि इस कहानी को लिखने का उनका मुख्य मकसद असम की इस दुखद परिस्थिति का चित्रण करना ही है। कुणाल अपने मकसद में कामयाब हुये हैं और यह रचना एक खूबसूरत कहानी बन कर उभरी है। उन्होंने यहां प्रेम को पाठकों को जोड़ने और उन्हें संवेदित करने वाले एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया है जिसमें बाधा पड़ने पर पाठक असम की हिंसा को अधिक गहराई से देखने की कोशिश करता है। लेकिन यही क्षमतावान कथाकार जब ‘प्रेम कथा में मोजे़ की भूमिका का तुलनात्मक अध्ययन’ जैसी प्रेम कहानी लिखता है तो बुरी तरह मात खा जाता है क्योंकि वहां प्रेम के बरक्स कोई वैसी बड़ी समस्या नहीं है जिसे सामने खड़ा कर वह प्रेम की विडम्बना को दिखा सके। वह अपनी आर्थिक स्थिति को सामने लाकर मोजे़ के फटे होने की बात सामने रखता है जो इसके विद्रूप को दिखाने में नाकाम रहती है। लेखक को इस प्रेम कहानी पर विश्वास भी नहीं है, यह कहानी में दिये उद्धरणों और फुटनोटों से स्पष्ट भी हो जाता है।
खालिस प्रेम कहानियों के मामले में नयी पीढ़ी के ज़्यादातर कथाकार गरीब हैं क्योंकि हमारा समय इतना उपद्रवी हो चुका है, इतना विडम्बनात्मक हो चुका है कि प्रेम के रूप में भेस बदल कर कब क्या कहानी में घुस जाये, कहना मुश्किल है। मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी ‘और हंसो लड़की’ का प्रेम संवेदित करता है लेकिन पितृसत्तात्मक समाज का वही पुराना ढांचा उसे अपनी गिरफ्त में ले लेता है और इस प्रेम कहानी की असमय मौत हो जाती है। गांवों में ऐसी स्थितियां आज भी आम हैं और मनोज इसे दिखाने में कामयाब हुये हैं। चंदन पाण्डेय की कहानी ‘सुनो’ भी प्रेम की खूबसूरत गाथा कहती हुयी अपने बाद के हिस्से में पात्रों के साथ पाठकों को भी चौंकाती है। पत्नी को वेश्यावृत्ति में लिप्त बताये जाने का जो ट्विस्ट हैं उनके सामने कहानी का प्रेम छोटा होता दिखता है लेकिन पत्नी का इसके लिये मान जाता इसे एक बड़ी और बेहतरीन प्रेम कहानी का दर्ज़ा दिलाता है। राकेश मिश्र ने शुरुआत में कैम्पस और प्रेम की ही कहानियां लिखी हैं लेकिन उनकी कहानियों का प्रेम एकांगी है। वह शुरू में आकर्षित तो करता है लेकिन बाद में उन सभी का हश्र एक जैसा होता है। उनकी कहानियों का प्रेम चोट खाया हुआ प्रेम है और अपने समय को व्यंजित करता है। उनकी कहानियों का प्रेम बहुत रियलिस्टिक होने की वजह से याद रहता है मगर एक जैसा होने की वजह से देर तक उसका प्रभाव नहीं रहता। ए. असफल. ने ज़रूर कुछ अच्छी प्रेम कहानियां लिखी हैं लेकिन उनकी ‘पांच का सिक्का’ जैसी कहानियां स्मृति में अधिक बनी रहती हैं बनिस्पत उनकी प्रेम कहानियों के। पंकज सुबीर के कहानीकार की नज़र प्रेम के नंगे यथार्थ पर अधिक रहती है और वह अक्सर प्रेम के विद्रूप को सामने लाने में विश्वास करते हैं लेकिन ‘चौथामल मास्साब और पूस की रात’ में एक अल्पकालिक लेकिन निस्वार्थ प्रेम जुगनू की तरह टिमटिमाता हुआ दिखायी देता है। गौरव सोलंकी के पास ढेरों प्रेम कहानियां हैं और कई अच्छी भी। ‘पीले फूलों वाला सूरज’ या ‘रमेश पेण्टर और एक किलो प्यार’ ऐसी कहानियां हैं जिनपर लेखक को विश्वास है और वह किसी सामाजिक मुद्दे का मसाला डालने की ज़रूरत नहीं समझता।
प्रेम कहानी लिखना आत्मविश्वास का और खतरे उठाने का काम है। कोई भी लेखक बेरोज़गारी और अपराध पर कहानी अपेक्षाकृत अधिक आसानी से लिख सकता है क्योंकि इस माहौल में वह रह रहा है और इससे उसका रोज़ का लेना देना है.सांप्रदायिकता और जातिवाद भी ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हम रोज़ दो चार होते हैं। प्रेम की सूरत एक तो देखने को मिलती नहीं और जो तस्वीरें मिलती हैं उनमें बहुत सी समस्याएं हैं, बहुत भटकाने और भ्रमित करने वाली चीज़ें हैं। किसी एक सामाजिक मुद्दे को उठा कर उस पर अख़बारी शोधों और कल्पनाओं की मदद से कहानी लिखना एक सहज प्रेम कहानी लिखने की तुलना में आसान है। ध्यान रहे कि मैं अच्छे और बुरे पर कोई फैसला नहीं दे रहा सिर्फ़ प्रक्रिया पर बात कर रहा हूं। कई नये लेखकों ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत में ही सांप्रदायिकता जैसे नाजु़क मुद्दे पर कहानी लिखी है और उसे अच्छी तरह निभाया भी है। नीलाक्षी सिंह की कहानी ‘परिंदे के इंतज़ार सा कुछ’ उनके पहले संग्रह में शामिल है और इसमें उन्होंने दोस्ती और प्रेम का प्रयोग सांप्रदायिकता के ज़हर के रंग और अधिक चटक दिखाने के लिये किया है। ज़ाहिर है उनकी कहानी में प्रेम है तो ज़रूर लेकिन उनका ध्यान धर्म के अश्लील प्रदर्शन को रेखांकित करने में थोड़ा अधिक है इसलिये कुछ दिल को छू लेने वाले प्रसंगों के बावजूद यह कहानी प्रेम के नाजुक पक्ष से न्याय नहीं कर पाती और एक फ़ॉर्मूले का शिकार नज़र आने लगती है।
प्रेम का उपयोग अपने पक्ष में करने और उसे ठगने के जितने तरीके जि़ंदगी में प्रचलित हैं उससे कहीं ज़्यादा कहानी में होते हैं। कहानी लिखने का सबसे आसान फ़ॉर्मूला हमेशा से यही है कि एक-एक नायक नायिका चुने जाएं जिनके बीच में वर्ग,नस्ल, आर्थिक या धार्मिक असमानताएं हों, पहले एकाध मासूम घटनाओं से उनके बीच प्यार पैदा किया जाये फिर थोड़ी देर बाद धार्मिक उन्माद, जातिगत भेदभाव या आर्थिक असमानता (या किसी अन्य कारण से भी) के कारण इस प्रेम की अकाल मौत कर दी जाय, ऐसी कहानियां पाठकों को अपील भी करती हैं और कहानीकार को जागरुक और समय के प्रति सजग कहानीकार की संज्ञा भी दिलवाती हैं। मगर मेरी नज़र में यह कहानीकार की एक कमी भी है कि वह अपने नायक नायिकाओं को ऐसी समस्याओं से लड़ते हुये दिखाता तो है मगर कभी उसके नायक नायिकाएं इससे जीत नहीं पाते। ठीक है, हो सकता है जीवन में ऐसा न होता हो लेकिन कहानी में भी वैसा न हो जो जीवन में नहीं होता तो फिर वह काहे की कहानी। मैं खुद बतौर कहानीकार इन समस्याओं से अब तक नहीं उबर पाया हूं और ज़रूर कहूंगा कि बहुत इच्छा होने के बावजूद ऐसी प्रेम कहानी अब तक नहीं लिख पाया हूं जिसमें सिर्फ़ प्रेम हो। हालांकि यह भी सच है कि जब आप प्रेम में होते हैं तो उस पर न तो कहानी लिख सकते हैं और न कविता. मैं जब प्रेम में था तो मेरे भीतर उतना आत्मविश्वास नहीं था लेकिन प्रेम ने ही मुझे यह आत्मविश्वास दिया है कि शायद मैं जल्दी ही कोई प्रेम कहानी लिख पांऊं जिसमें सिर्फ़ प्रेम हो।
प्रेम कहानियां लिखना जिसमें और कोई समस्या न हो,सिर्फ प्रेम से जुड़ी समस्या हो, काफी कठिन है। बिना किसी बाज़ारू फ़ॉर्मूले के प्रेम कहानी वही कथाकार लिख सकता है जिसे अपनी कहानी और उस कहानी में चल रहे प्रेम पर भरोसा हो। नीलाक्षी सिंह की बहुचर्चित कहानी ‘परिंदे....’ से बेहतर मगर कम चर्चित कहानी है ‘आदमी औरत और घर’ क्योंकि यह कहानी अधिक ईमानदार है। लेकिन हमारे समय की समस्या यही है कि कहानियां ज़्यादातर वे अधिक चर्चित होती हैं जो हमारी आंख में उंगली डालकर हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती हैं, सहज कहानियां कम। हमारा अभ्यास भी धीरे धीरे ऐसा हो गया है कि ऐसी कहानियां ही हमें देर तक याद रह जाती हैं जो अपनी बात थोड़ा लाउड होकर कहती हैं या फिर अपने शिल्प में कुछ खास होती हैं। सोनाली सिंह की कहानी ‘सात फेरे’ इस मामले में एक मानीखेज़ कहानी है जिसकी जितनी चर्चा होनी चाहिये थी, नहीं हुयी। इस कहानी में एक पत्नी को लगता है कि काफी देर से नहीं लौटा उसका पति शायद मर चुका है। कहानी इसके बाद है जब पत्नी खुद को इसके लिये तैयार करने लगती है और एहसास होता है कि इस तरह जि़ंदगी शायद कुछ ज़्यादा आसान होगी और वह अपने पति की मौत से उतनी दुखी नहीं है जितना खुद के आज़ाद होने से खुश है। आखिरकार देर रात गये उसका पति लौट आता है और वह उसे देख कर रोने लगती है। इसी रोने में सारी कहानी है लेकिन अगर लेखिका इस सहज और खूबसूरत कहानी को कुछ शैल्यिक प्रपंचों के सहारे आगे बढ़ातीं और चैंकाने के कुछ प्रयास करतीं तो शायद कहानी को अधिक चर्चा मिलती। इस लिहाज़ से कविता की कहानी ‘मेरी नाप के कपड़े’ भी ईमानदार और सहज कहानी है। किसी कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने के बावजूद मुझे लगता है कि कविता की अन्य कहानियां जो अपनी शैलीगत विशेषताओं या चुभते विषयों के लिये अधिक लोकप्रिय हैंके आगे इस कहानी की चर्चा कम हुयी है। वंदना राग की कहानी ‘शहादत और अतिक्रमण’ एक बेहतरीन प्रेम कहानी है, हालांकि स्त्री मुक्ति की आकांक्षा और आज़ादी की इच्छा कहानी में कई बार प्रेम पर हावी दिखते हैं लेकिन यह कहानी फिर भी सहज बनी रहती है क्योंकि आखिरकार ये सब प्रेम के ही बाइप्रोडक्ट हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘खरपतवार’में भी प्रेम का सहज और एक अलग रूप सामने आता है और वह याद रह जाती है। मनीषा कई बार ऐसे क्षेत्रों में भी सेंध लगाती हैं जहाँ का अनुभव उनका अपना नहीं बल्कि आयातित है लेकिन अक्सर इसे वह अपनी ईमानदारी की ताकत से संभाल ले जाती हैं.
प्रेम कहानियों को हमारे समय की फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गुंडा’ और ‘पुरस्कार’ जैसी कहानियां बीते दिनों की बात हो गयी हैं तो इसमें एक बात यह भी है कि हमारी फिल्मों में प्रेम का स्वरूप बदल चुका है। यही बात पूरी तरह से समाज के बारे में नहीं कही जा सकती क्योंकि छोटे शहरों और गांवों में प्रेम का स्वरूप आज भी कमोबेश वैसा ही है। प्रेम करना आज भी सबसे बड़ा अपराध है और खाप जैसी कुप्रथाओं ने इसे और बड़ा अपराध बनाया है। ऐसे में कोई प्रेम कहानी सिर्फ़ अपने प्रेम की वजह से याद रह जाये तो यह उस कहानीकार की विशेषता कही जायेगी।
संवेद के जुलाई २०१० के अंक में छपी युवा लेखिका मंजुलिका पाण्डेय की कहानी ‘अति सूधो सनेह को....’ में एक ऐसा प्रेम है जो दिये की लौ सा कुछ देर टिमटिमाता है और फिर बुझ जाता है। लेकिन नहीं, यह बुझता नहीं है, हमारी अधिकतर उपमाएं ऐसे ही गलत साबित होती हैं क्योंकि जो बुझ गया वह प्रेम कहां था। कहानी शुरू ही इस सवाल से होती है कि क्या थे वे दोनों एक दूसरे के थे,  किस लोक से थे,  एक बावन बरस की प्रौढ़ स्त्री अपनी चौदह बरस की उम्र में जाती है और हम देखते हैं कि उसकी जि़ंदगी में एक समवय लड़का आता है। इस लड़के का आना उस समय में है जब अनारकली फिल्म रिलीज हो रही है जिसमें गीत है ‘ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया,प्यार ही में खो गया।‘ फिल्म का प्रयोग लेखिका ने बड़ी कुशलता से उस वक़्त को उकेरने के लिये किया है और इस गीत के साथ ही उस वक्त की अधिक फौलादी बेडि़यां भी साकार होने लगती हैं। चौदह साल की लड़की की मां उसके पिता से बात करते हुये कहती है कि इसकी दोनों बहनों का इसकी उम्र में गौना हो चुका था, पिता कहते हैं कि समय थोड़ा बदला है। चौदह साल की लड़की मनोरमा अपने ललटेन कक्का से दुनिया जहान की बातें करती है जो अचानक कुछ दिनों के लिये गायब हो जाते हैं। वह जब आते थे मनोरमा को मीठी गोलियां दिया करते थे। उनकी जगह एक लड़का लालटेन जलाने आता है जो मनोरमा को घमण्डी लगता है। मनोरमा उससे चिढ़ने लगती है। यह चिढ़ना ही अपनेपन की शुरुआत है। किसी पराये से कहां कोई चिढ़ता है,कोई शिकायत करता है। लालटेन कक्का बाद में उससे पूछते हैं कि क्या वह उनकी अनुपस्थिति में मनोरमा को मीठी गोलियां दे रहा था। मनोरमा इनकार करती है और उसे लगता है कि लड़का कितना बदमाश है कि उसे कक्का ने उसके लिये गोलियां दीं और उसने उसे नहीं दिया। उसकी आंखें मनोरमा को शंकर भगवान की आंखों जैसी लगती हैं। वह धीरे-धीरे मनोरमा के घर में दाखिल हो जाता है और चुपके से उसकी ज़िन्दगी में भी। वह किताबें पढ़ता है और किताबों के जरिये ही उससे संवाद करता है। वह धीरे-धीरे उसे पसंद करने लगती है। टू मिनट नूडल वाले ज़माने में प्रेम होने की यह गति थोड़ी धीमी लगती है लेकिन यही प्रेम की असली गति है, पहली नज़र वाले प्रेम के प्रति पूरा सम्मान रखते हुये भी यह कहना ज़रूरी है कि पहली नज़र के प्रेम की अवधारणा पूरी तरह सामंती अवधारणा है। लड़के का नाम उत्पल मनोरमा के पिता जी द्वारा ही रखा गया है जिसे वह उपला, गोबर समझती है। उत्पल उसके पुस्तकालय में आकर बैठता और किताबें पढ़ता है, किताबें ही दोनों के बीच आत्मीय संवाद का पहला माध्यम बनती हैं और लड़का किताब में एक दिन लिख कर चला जाता है कि आपके बाल बहुत खूबसूरत हैं। किशोर लड़की हवा में उड़ती है और जिस दिन वह पाती है कि लड़के ने एक किताब में उसका नाम बार-बार उकेर कर लिखा है,वह प्रेम के नशे को महसूस करती है। लड़की अपनी अम्मा से कहती है कि वह उसे उसके पूरे नाम मनोरमा से पुकारा करें, रमा नाम उसे बचकाना लगता है। प्यार की यह वही अवस्था है जिसमें दुनिया को ऐसा प्रेम बचकाना लगता है और प्रेमियों को पूरी दुनिया बचकानी लगती है।
लड़की की शादी तय हो जाती है और लड़का उसकी हथेली में मीठी गोलियां देते हुये कहता है, “मैं हमेशा तुम्हारा कर्ज़दार रहना चाहता था। पर उसके लिये अब इसकी ज़रूरत नहीं है,इसलिये लौटा रहा हूं।“
लड़की गोलियां गिनती है। उसे बीस गोलियां मिलती हैं। ललटेन कक्का उन्नीस दिनों तक लालटेन जलाने नहीं आये थे और बीसवीं गोली लड़के की ओर से उपहार है। यह मिठास प्रेम की मिठास है जो लड़के ने लड़की की हथेलियों में भरी है। उसकी गोलियां खत्म हो जाएंगी लेकिन यह मिठास उसकी पूरी जि़ंदगी में रहेगी। लड़का गोलियां देने के बाद उससे कहता है, “आप बहुत अच्छा गाती हैं, इसे बनाये रखियेगा।“
       देखा जाय तो कहानी में कहीं मुखर प्रेम नहीं है, दो किशोरों के प्रेम को समाज तो समाज, साहित्य ने भी थोड़ा कम ही भाव दिया है। लेकिन मुख्य बात है कि प्रेम के भाव का स्थायित्व जो पूरी जि़ंदगी साथ रहता है।
“आंखों की इस भाषा को, इस भाषा में लिखी कहानी को कौन पढ़ पाया। कोई भी तो नहीं।“
ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि यह कौन सा प्रेम है जिसके लिये लेखिका कभी गलदश्रु भावुकता वाले भाव में नहीं आती है जबकि दो किशोरों की इस प्रेम कहानी में इसकी गुंजाइश और संभावना बहुत थी। यह लेखिका का संतुलन है कि वह इस तत्व को कहानी में भलीभांति स्थापित करती है है कि प्रेम की ताकत यही है कि यह आपको आज़ाद करे। शादी के बाद मनोरमा बहुत खुश है, उसका पति जयेन्द्र भी बहुत खुश है। इस समय लेखिका ने कहीं किसी हूक के उठने का इशारा नहीं किया है। बेटी के जन्म पर वह बहुत खुश है मगर प्रेम उसकी जि़ंदगी में हवा की तरह उपस्थित है। पति के बहुत कहने पर भी वह अपने बाल छोटे नहीं करवाती और गाने का अभ्यास हमेशा करती रहती है। इन्हीं दो बातों में पूरी प्रेम कहानी समाहित है। उसकी बेटी कहती है, “मां! मैंने सिर्फ़ दो चीज़ों के लिये आपको कांशस देखा है। एक आपके बाल, दूसरा आपका संगीत अभ्यास।“लड़की ने अभी तक अपने प्रेम को अपने भीतर जीवित रखा है।
आज की वाचाल प्रेम कहानियों के बीच यह प्रेम कहानी इसलिये खास है क्योंकि कितनी भी आधुनिकता के बाद भी आज हमारे समाज का बड़ा हिस्सा प्रेम को लेकर तालिबानी मानसिकता से ग्रस्त है मगर हमारी प्रेम कहानियां इनके चित्रण में कमोबेश नाकाम रही हैं। हमारे पास जो प्रेम कहानियां हैं वह ज़्यादातर शहरों और महानगरों से हैं जिनमें प्रेम और देह के समीकरण एक दूसरे में गहरे तक समाए हुये हैं। यहां समस्याएं दूसरी हैं, प्रेम के रंग यहां भी है और बहुत सारे रंग हैं लेकिन दूसरी समस्याएं इतनी हावी हैं कि प्रेम ज़्यादा देर तक कायम नहीं रह पाता। छोटे कस्बों और गांवों में भी पहले से बहुत अधिक परिवर्तन आये हैं लेकिन वहां ये परिवर्तन भौतिक अधिक हैं, मानसिक रूप से आज़ादी के लक्षण अधिक दिखायी नहीं पड़े हैं। लेखिका ने जानबूझ कर कहानी में फ्लैश बैक का प्रयोग किया है और कहानी को छत्तीस साल पहले के माहौल में ले गयी हैं जिससे उस समय की बंदिशों के साये में इस प्रेम को देखा जा सके।
ऐसी कहानियों पर अक्सर अतिभावुकता के इल्ज़ाम लगते रहे हैं और लगाने वालों ने तो ‘उसने कहा था’ तक को कई बार ख़ारिज़ करने की कोशिश की है। उत्तर राजेन्द्र यादवीय कहानियों के दौर में, जहां प्रेम के नाम पर सिर्फ़ दैहिक आकर्षणों की गाथा और एक रात के स्टैण्ड हैं, यह कहानी अविश्वसनीय रूप से प्रेम के एक ऐसे अर्थ पर बात करती है जहां बिना रोये धोये, बिना देने पाने की चिंता किये और बिना किसी कमिटमेंट अपनी जि़ंदगी पूरे मन से जीनी है लेकिन अपने मन के किसी कोने में उस प्रेम को संजोते और बचाते हुये। प्रेम का इससे बेहतर और निस्वार्थ अर्थ नहीं हो सकता। कहानी की शुरुआत में ही इस संबंध के बारे में लेखिका कहती हैं, “ऐसे ही इस लोक में हुआ है जिसपर अपरिपक्व रूमानियत का इल्ज़ाम लगाकर, फ्रायडीय मनोविज्ञान के निशाने साधकर खूब हंसी तो उड़ायी जा सकती है लेकिन भीतर ही भीतर एक मिठास भरी टीस से भरने से नहीं बचा जा सकता। वे दोनों एक दूसरे के साथ न होकर भी साथ रहे,  हर समय और यह साथ होना इतना आत्मस्थ था कि उन्हें पता तक नहीं चल पाया। भरते रहे दोनों एक दूसरे को बिना जाने कि भर रहे हैं, कुछ दे रहे हैं, ऐसे जैसे यह देय नहीं प्राप्य हो।“
इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि नायिका अपने परिवार के साथ खुश है, अपने पति को प्रेम करती है,अपने जीवन से खुश नज़र आती है लेकिन वह जो प्रेम पा रही थी, अपने भीतर समा रही थी, वह किसी और के एहसास में लिपटा हुआ आता था। सुनने में रुमानियत भरी लगती है लेकिन यह बात कितनी सच्ची है जब हम सब अपने भीतर झांकते हैं और पाते हैं कि मन के किसी कोने में हमने बरसों से किसी का दिया कुछ छिपा कर रखा हुआ है। हम अपनी जि़ंदगियों को जी रहे हैं, पूरी ताकत से लड़ रहे हैं अपनी परेशानियों से लेकिन अक्सर जो कुछ अच्छा है, उसका स्रोत हमारे जीवन से दूर जा चुका हैदूर जाने वाले स्रोत को अपने भीतर जि़ंदा रखना ही तो प्रेम है।
लालटेन जलाने वाली परंपरा हमारे लिये एलियन की तरह है जिसे पढ़कर याद आता है कि कितनी ही ऐसी परंपराएं समय की भेंट चढ़ गयी हैं जिनमें सामूहिकता का भाव था जो पूरे गांव को, पूरे समुदाय को एक परिवार की तरह एक सूत्र में बांधता था। मनोरमा का उत्पल के लिये खाना बनाना सीखना, खाने में कम मिर्च डालने की बात सोचना, उसकी लाल आंखें देखकर सोचना कि कहीं उसे बुखार तो नहीं हो गया, ये सब उस प्रेम की बातें हैं जो पढ़ने सुनने में पुरानी लगे लेकिन कस्बों और गांवों में जिनका रूप ठीक उसी तरह बरकरार है जिस तरह यह कहानी हमें बताती है। मनोरमा अपनी बेटी के होने पर उसका नाम मनोत्पला रखती है, उसकी पति कहता है कि एक विदुषी महिला ऐसा ही नाम रख सकती थी। यह एक ऐसी गीली मिठास वाला प्रेम है जिसकी मिठास जीवन भर महसूस होती है। प्रेम के बहुत से रूप निश्चित रूप से होते होंगे लेकिन यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें प्रेम सबसे सहज और आत्मीय रूप से आता है। आता है और छा जाता है, हमें डुबो लेता है, भिगो देता है और हमसे कहता है - मैं क्या जानूं क्या जादू है, इन दो मतवारे नैनों में।

-विमल चन्द्र पाण्डेय
प्लाट नं. 130-131
मिसिरपुरा, लहरतारा
वाराणसी-221002 (उ.प्र.)
फोन- 9820813904

Wednesday, July 30, 2014

यहाँ विफलता नहीं संघर्ष को याद किया जाता है : प्रांजल धर.


विपिन चौधरी की कविताओं पर यह आलेख प्रांजल धर का हैं. यह आलेख जनपथ में जाना था लेकिन इससे पहले विपिन की कविताओं पर अशोक कुमार पाण्डेय( अब के अशोक आज़मी) और महेश वर्मा का आलेख आ गया तो हम वहाँ नहीं दे पाए. प्रांजल भाई समय के बेहद पाबंद हैं और हमारे द्वारा दिए गए समय सीमा में उन्होंने लिख कर दिया भी लेकिन हम कुछ मजबूरियों से नहीं दे पाए. बहरहाल;  प्रांजल भाई से क्षमा के साथ उस आलेख को जनराह पर दे रहे हैं. आशा है, आप अपनी राय से अवगत कराएंगे. (मॉडरेटर) 

           पिछले कुछ समय से युवा कवयित्री विपिन चौधरी की कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने और अनेक मंचों से सुनने को मिलती रही हैं। उनका लेखन मन को भीतर तक स्पर्श करता है। विपिन चौधरी की कविताएँ गहन प्रेक्षणों और बारीक जीवनानुभवों की कविताएँ हैं। कविताओं में जो वे कह रही होती हैं, महज उतना ही उनकी कविता का अभिप्रेत नहीं होता। इसके उलट कविताओं की पंक्तियों के पीछे यथार्थ की तमाम परतें अनावृत होती देखी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए हम उनकी एक साधारण-सी लगने वाली कविता पुलिया पर मोची को देख सकते हैं जहाँ मोची की उम्र और उस पेड़ की उम्र में एक वाजिब समानान्तरता देखी जा सकती है जिसके नीचे वह बैठा करता है। यहाँ कवयित्री के अपने अनुभवों के वलय भी पाठकों का ध्यान खींचते हैं, जब वह कहती है कि अपने बचपन में इसी मोची और इसी पेड़ को देखने का नज़रिया कुछ और था और आज समय बदलने के साथ नज़रिया भी बदल गया है। इस कविता का यह प्रारम्भिक अंश द्रष्टव्य है :
पुलिया काफी पुरानी है 
उस पर, पीपल की छाँव तले बैठा यह मोची भी
पेड़ की उम्र से मोची की उम्र का पता नहीं चलता 
न मोची की उम्र से पेड का
और न पानी की गति का
बिना लाग लपेट पुल के नीचे बहता है
  
बचपन में इस पुलिया से गुज़रते हुये
थक जाने पर
माँ की गोदी के लिये मचलती पुलिया के नीचे बहते पानी में अपनी परछाई
देख खुश होती
दिखता यही मोची जूते 
गाँठता

तब पुलिया और मोची आकर्षण नहीं था
बचपन के पास दूसरी चीज़ें थीं।

           आमतौर पर हम बड़ी-बड़ी चीज़ों और घटनाओं को देखने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अनेक छोटी-मोटी बातें हमारी निगाहों में नहीं आ पातीं या फिर हम उन्हें देखना-जानना और उनके बारे में समझना प्रायः महत्वहीन समझते हैं। सन्त रहीम ने शायद यही सब सोचकर लिखा होगा कि रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। पर बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट यानी कचरे में से भी काम की उपयोगी वस्तु खोज लेने वाली कवयित्री की दृष्टि उन अदेखे इलाकों तक भी जाती है, जहाँ किसी भी सरोकार वाली रचना को जाना ही चाहिए। विपिन की एक कविता है रसूल रफूगर का पैबन्दनामा। एक सधे हुए शिल्प में यह कविता कुछ अधिक मानवीय बिम्बों की रचना करती है :

वह फटे कपड़े पर जालीदार पुल बनाकर   
कपड़ों का खोया हुआ मधुमास वापिस कर देता है 

जब रसूल के इस हुनर को खुली आँखों से देखा नहीं था
तब सोचा और जाना भी नहीं था
कि फटी चीज़ों से इस कदर प्रेम भी किया जा सकता है

           इस कविता में एक आम भारतीय की घर-गृहस्थी के दुखों का महीन तानाबाना है, उस जाल का चित्रांकन है जो किसी गृहस्थ को नमक-रोटी की जुगत के लिए घेरे रहता है। किसी की बेवा बहन है तो किसी की तलाकशुदा बेटी है घर में। एक आम मध्यमवर्गीय परिवार, बल्कि कहना चाहिए कि गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की समस्याओं का पूर्ण चित्र इन कविताओं में से झाँकता रहता है। आज जब हर तरफ परिवर्तन और उसके लिए व्यक्त की जाने वाली अकुलाहट का जिक्र होता रहता है, तब यह कविता बहुत प्रासंगिक नजर आती है क्योंकि इसमें कवयित्री बिना किसी पूर्वग्रह के इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि अगर क्रान्ति की चिंगारी किसी को थमानी हो तो इस रफूगर से ज्यादा योग्य दूसरा कोई हो नहीं सकता।
           विपिन की कविताओं में अपने समय की विसंगतियों पर व्यंग्य है, विसंगतियों के विस्तार और आकार पर व्यंग्य है, उनकी सूक्ष्मता से मुठभेड़ है और राजनीति के ककहरे को समझने की गहराई है। अपनी कविता लोकतंत्र का मान रखते हुए में वे लिखती हैं : “कम्बल से एक आँख बाहर निकालकर हम बाशिन्दों ने/ इन सफेद पाजामाधारी मदारियों के जमघट का तमाशा खूब देखा/ सावधानी से छोटे-छोटे कदमों से ये नट उछल-कूद का तमाशा खूब दिखाते। हर पाँच साल में होने वाले लोकतंत्र के निर्वाचन महापर्व की सच्चाई के पीछे आम जनता के प्रति किए गए कितने वादों की कितनी ही परतें दबी होती हैं, इसका अन्दाजा हमें इस कविता से मिलता है। यहाँ आकर कुछेक बिन्दुओं पर यह कविता एक गहन विचार कविता की शक्ल अख्तियार कर लेती है। विपिन के यहाँ कविता में कल्पना तो है, पर हवाई और निराधार कल्पनाएँ नहीं हैं। यहाँ अनुभूति की तीव्रता तो है, पर ये अनुभूतियों में कृत्रिमता या बनावटीपन हर्गिज नहीं है। यहाँ अनावश्यक भावनाओं का उबाऊ अम्बार नहीं है, गलदश्रु भावुकता का मिथ्यातिरेक नहीं है बल्कि मर्मवेधी चित्र हैं जो हमारे-आपके आसपास से उठाए गए हैं।
           कपालिक अघोरी की तरह, कील, प्रथम पुरुष और सिम्फनी जैसी कविताओं का फलक बहुत व्यापक है, भले ही ये प्रथमदृष्टया छोटे विषयों पर रची गयी कविताएँ लगती हैं। विपिन की कविताएँ बताती हैं कि कविताओं का अर्थ मन से नहीं, बल्कि कानों से लिया जाता है। अर्थग्रहण और भावग्रहण की ये तरकीबें कविता में आकर एक नया वितान-सी रचती मालूम पड़ती हैं और पाठक कविताओं का रस लेता ही रहता है। स्वर-लहरियों की उठान से खाली मानव मन का कोना कितना सूना हो सकता है, और कला उसमें कितना रस भर सकती है, इसके दृष्टान्त हमें विपिन की कविताओं में बखूबी मिलते हैं। वे लिखती हैं कि संगीत की मादकता के लिए एक पुल पर कोमलता से चलना होता है। आज जब हर तरफ खतरनाक किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक किस्म के सरलीकरणों का बोलबाला है तब ऐसी कोमलता को सुरक्षित रखने की कवयित्री की कामना उन्हें विशिष्ट बनाती है। साथ ही ये कविताएँ तथाकथित भूमण्डलीकरण के दुष्परिणामों को उकेरती हैं और हमें इस बात के लिए सजग करती हैं कि सूखती जा रही मानवता की धारा को किस तरह बचाया जाए। आज भी ऐसे लोग हैं जो किसी अलमस्त बेहोशी में कुछ नेक काम कर दिया करते हैं, जैसे गाय को आटा या कुत्ते को रोटी खिलाना या फिर किसी भूखे व्यक्ति के लिए खाने का इन्तजाम करना। ये कविताएँ इस बात की सराहनीय कोशिश करती हैं कि नेक कामों की नेकनीयती को समझने के ईमानदार प्रयास किए जाएँ। अनुभवों की रोशनाई से रची ये कविताएँ हमें ऐसे सन्देशों के प्रति जागरूक करती हैं जिन्हें जरूरत से ज्यादा बार सुना और कहा गया है और इसीलिए अब ये सन्देश हमारी तंत्रिकाओं में जम-से गए हैं। ईमानदार लेकिन सिरफिरे लोग किस तरह हाशिए पर डाल दिये जाते हें और उनका नाम देश के जनसंख्या रजिस्टर में से हटा दिया जाता है, इसका सुन्दर नमूना हमें सिरफिरा नामक कविता में मिलता है। ऐसी कविताएँ व्यवस्था विरोध की ईंट से कविता की इमारत को गढ़ती हैं।
           जिस तरह पूरी दुनिया को एक ही खास रंग और एक ही खास भाषा में रँगने की साजिश जारी है, उसमें एकरसता के खिलाफ जाने वाली एक कविता अपनी एकता के बलिहारी की ये पंक्तियाँ शोषण की संरचनाओं की बखिया उधेड़ने वाली लगती हैं : तुम्हारी भूख और मेरी प्यास एक नहीं थी/ फिर भी एक ही सिक्के की उलट-पलट थे  हम/ चाहे किसी भी  कोण से दिखे/ हमें एक जैसा ही दिखना था ऐसे हालात के प्रति विपिन विद्रोह का स्वर भी उभारती हैं और कई बार उनकी कवताएँ देश-दुनिया और समाज की स्त्रियों के लिए आवाज भी उठाती हैं। पर याद रखना चाहिए कि यह सब विपिन के यहाँ बहुत गहराई में जाकर सम्पन्न होता है, न कि प्रदर्शनबाजी या नारेबाजी की शक्ल में। ऐसे कुछ मोड़ों पर आकर ये कविताएँ सृजनात्मकता और चिन्तनशीलता का सुन्दर कोलाज बनाती हैं।
           अगर कुछ सीमित शब्दों में कहना हो तो विपिन की कविताओं का सूत्रवाक्य शायद यही होगा कि यहाँ विफलता नहीं, संघर्ष को याद किया जाता है। पर कैसे संघर्ष को और किसके संघर्ष को याद किया जाता है? इस सवाल के उत्तर विपिन की अनेक कविताओं में व्याप्त हैं। मसलन, यासिर अराफात का संघर्ष या फिर अपने अस्तित्व को जूझ रही अनेक भाषाओं का बुनियादी संघर्ष या फिर जीवन के लिए हाँड़तोड़ मेहनत करने वाले मजूरों का संघर्ष वगैरह। इससे कवयित्री की प्रतिबद्धता का पता चलता है और कवयित्री ने लिखा भी है कि प्रधानमन्त्री तो बल्लियों के उस पार हैं, हम तो जनता हैं, हमें बल्लियों के इस पार ही रहना है। तमाम यथास्थिति का विरोध करती ये कविताएँ आम जनता के संघर्षों से अपनी ऊष्मा को सँजोती हैं और कविता में आमफहम बिम्ब ले आती हैं जिनसे हम भीतर तक अपना जुड़ाव इन कविताओं से महसूस कर पाते हैं।
           जो भी तंत्र है, वह मानव को सुख-सुविधा और सुशासन देने के नाम पर जो कुछ देता आया है, विपिन उन सबका लेखन करती हैं। मसलन, दंगे, पुलिस, पिटाई और राजनीति आदि। परंतु पीड़ा का तो फलसफा ही ऐसा है जिसे कोई शासन या प्रशासन या उसका कोई भी तंत्र समझ ही नहीं सकता। जो कविताएँ प्रेम को विषय बनाकर रची गईं हैं या जिन कविताओं में प्रेम का चाहे-अनचाहे जिक्र हुआ है, वे समग्रता में इस विषय को प्रस्तुत करती हैं और कुछ अछूते कोनों का भी संधान करती हैं। यहाँ यह बात जोड़नी होगी कि उनकी कविताएँ एक स्त्री मन की कविताएँ तो हैं, पर उनकी संवेदनाएँ सिर्फ स्त्रियों तक सीमित नहीं हैं। न ही उनकी कविताएँ किसी संकीर्णता की शिकार हैं। कुल मिलाकर विपिन की कविताएँ हमें एक ऐसे बहुरंगी भावजगत में ले जाती हैं जहाँ कल्पना और यथार्थ के अपने-अपने रंग हैं, जहाँ परिवर्तन की बेचैनी है और जहाँ पहुँचकर आशा का संचार होता है।
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प्रांजल धर
2710, भूतल
डॉ. मुखर्जी नगर
दिल्ली – 110009
मोबाइल - 09990665881
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Sunday, January 12, 2014

विमल चंद्र पाण्डेय की लंबी कविता : मुर्गी पंडित.


विमल ने अपनी कहानी "मन्नन राय गज़ब आदमी  हैं" में एक रियल किरदार मन्नन राय के जरिए मन्नन राय का नायकत्व गढ़ने के दौरान हमारे समय से छूट रहे गली मोहल्ले के नायक को याद किया था. कहानी बहुत चर्चित-प्रशंसित रही है. इस बार विमल अपनी कविता में उसी गली मुहल्ले के किरदार "मुर्गी पंडित" को लेकर हमारे ’दलदल समय’ को देखने की कोशिश कर रहे हैं. इस कविता पर ज़्यादा कहना पाठक से उसका अर्थ छीन लेने जैसा होगा. तो पेश है युवा कवि-कथाकार विमल की नयी कविता ’मुर्गी पंडित.’

     

मुर्गी पंडित


लहरतारा के छोटे से उस मोहल्ले में जितना विकराल मुर्गी पंडित के घर का गेट था
उतनी बड़ी थी हमारी सीमायें और हमारे लिए लगाये गए प्रतिबंधों का आकार भी
लगभग उतना ही बड़ा था
हमारी पतंगें कट कर जब मुर्गी पंडित के अहाते में चली जातीं
हम उस पतंग को रणभूमि के शहीदों में जोड़ गिनने लगते थे अपने चिल्लर

घर अपने स्थापत्य में अकेला था
अपनी उपस्थिति में डरावना और
अपने सन्नाटे में अक्सर चीखता रहता था हमारी पतंगों के अपने पिछवाड़े के बगीचे में समोए
मुर्गी पंडित इस बड़े घर में अकेले रहते थे यह नहीं कहा जा सकता
उनकी सैकड़ों मुर्गियों को हमें जोड़ना होगा घर के सदस्यों में
या फिर देखते-देखते जिंदा हो उठने वाली अफवाहों में

मुर्गी पंडित अकेले रहते हैं
या शायद कुछ मुर्गियों के साथ
यह सवाल हमारे लिए उत्तेजना की गली का सबसे दमघोंटू रास्ता था
हम जाना चाहते थे उस बड़े रहस्य घर के भीतर
वह घर हमारे सपनों में आता था जिस तरह मुर्गी पंडित आ जाते थे हमारी बातों के भीतर अचानक

चहल पहल वाली गलियों में कभी चहलकदमी नहीं की उन्होंने
सड़क पर कभी दिखे तो कुछ यूँ जैसे माँ की गोदी से छूटा कोई बच्चा भगा जा रहा हो माँ की तरफ
उस घर से रात बिरात आवाजें आती थीं उनके खांसने की
कभी कभी हनुमान चालीसा पढ़ने की
सिर्फ़ हम कुछ बच्चों से बातें करते वे उस गरम दोपहरी में
जब हमारे घरों में सोये होते थे सब और हम गलियों में खोजते थे कोई रोमांच
वे अक्सर हमसे लवण की परिभाषा पूछते फिर अम्ल और छार की भी
हमने नहीं समझा कि उनके जीवन में नहीं बचा था थोड़ा भी लवण
बेजान परिभाषाओं के दौर में अकेले रहने की मुर्गी पंडित की ज़िद नहीं समझ पाता था कोई
पुरे मोहल्ले में उन्हें पगलेट कहा जाता था जो बेटे बहुओं को भगा कर अकेले भोग रहा है पूरी संपत्ति

मुर्गी पंडित भूल चुके थे अपना नाम
जितनी मुर्गियां उनके घर में कुड़ कुड़ करती थीं
उससे अधिक थीं उनके मन में
उनके सीने से कुड़कुड़ाने की आवाज़ आती थी
उनका घर मुर्गियों की बीट सा महकता था

कब कोई मुर्गियों से इतना प्यार करने लगता है
कि भगा दे अपने बहू-बेटों को अपने घर से
सिर्फ इसलिए कि वे घर को मुर्गियों से खाली करवाने की बातें करें
इस दलदल समय में क्यों छूट जाता है कोई इतना पीछे
कि मुर्गियों और उसमें कोई फ़र्क बाकी नहीं रहता

कुछ लोग कहते थे कि मुर्गी पंडित तंत्र साधना करते हैं
तो कुछ जानकारों का यह दावा था कि वह किसी आपराधिक कृत्य में लिप्त हैं
पगलेट होने की आड़ लिए
कुछ बच्चे तो उन्हें ही चलता फिरता भूत समझते थे
और पी जाते थे हॉर्लिक्स मिला दूध एक बार में
मुर्गी पंडित भूत तो नहीं थे लेकिन वह भूत में रहते थे
भूत में रहना भविष्य में रहने से अधिक खतरनाक होता है

वैसे तो वर्तमान में रहना सबसे खतरनाक है आजकल
हम सब भूत या भविष्य के बंकरों में छिपे जा रहे हैं लगातार
मुर्गी पंडित ने इक्कीसवीं सदी को शायद भांप लिया था पहले ही
भूमंडलीकरण की उदार सहम उनके चेहरे पर कौंधती रहती थी

नब्बे के दशक की आहट सुन कर मुर्गी पंडित दूरदर्शन की शरण में चले गए थे
उनके बेटे और बहू तारा और कमांडर देखने की उम्मीद में जब घर छोड़ कर दिल्ली गए
उस वक़्त मुर्गी पंडित कृषि दर्शन देख रहे थे
जिसमें बताया जा रहा था कुक्कुट पालन की बारीकियों के बारे में
भावनाओं के पालन पर कोई कार्यकम न दूरदर्शन ने बनाया था
और न ही नए-नवेले निजी चैनलों ने

इतने भावुक हो गए थे वह अपने अंतिम दिनों में
कि किसी पड़ोसी से हो सकने वाली औचक बातों में उन्होंने व्यक्त की थी अपनी इच्छा
कि उनकी मृत्यु के बाद उनका शरीर उनकी मुर्गियों को खिला दिया जाए
वह भूल गए थे शायद मुर्गियों और गिद्धों के बीच का फ़र्क
किसके बीच रहते हुए कोई क्या भूल जाए
कहना मुश्किल है
तब और मुश्किल था जब उदारीकरण सबसे पहले मुर्गी पंडित के रहस्यमयी घर में ही उतरना चाहता था

उन्होंने अपने विशालकाय हवेलीनुमा घर को
किसी भी सरकारी ईमारत के तौर पर प्रयोग होने को मना किया
इस तरह एक पुरानी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को पहला उल्लेखनीय और ऐतिहासिक इनकार सौंपा था
और सीधा मना कर दिया था विकास के उस भीमकाय घोड़े को अपने आंगन में उतरने से
वह समय महत्त्वपूर्ण था ऐतिहासिक और कई अन्य दृष्टियों से
ऐसी बातों को मना करने वालों को विक्षिप्त कहने का चलन उसी समय के आसपास शुरू हुआ था

अस्सी की पैदाइश हम दौड़ते थे गलियों में नेकरें पहने
और हमसे भी तेज़ कोई चीज़ दौड़ रही थी
जिसे जल्दी ही हमारे घरों में और मन में जगह बना लेनी थी

हम दौड़ते हुए मुर्गी पंडित को अकेला और कमज़ोर होता देखते रहे
यह समझ पाने की हमारी उम्र नहीं थी कि उस शारीरिक कमज़ोरी में
उनके इरादों का फौलाद होते जाना शामिल था हर क्षण
अपने घर को उन्हें नहीं देना था किसी को चाहे सरकार हो या कोई निजी कम्पनी
और उनका मानना था कि देश को भी नहीं दिया जाना चाहिए किसी और को

उनकी बातों को न देश सुनता था न सरकार सुनती थी
उनके बेटे सुन तो लेते थे पर मानने को तैयार नहीं थे
एक अनवरत संघर्ष चलता रहा उनका उनके बेटों से
जैसे नयी और पुरानी पीढियां सही गलत की खाई से दूर लड़ रही हों
निस्तब्ध अँधेरे में सिर्फ़ आवाज़ की बिनाह पर

जिस पहचान को बचाने की लड़ाई मुर्गी पंडित लड़ रहे थे
वह मुर्गियों के साथ कुछ इस तरह गड्डमगड्ड हुआ था
कि लोग उनका पता बताते हुए सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य का घर नहीं कहते थे 
बताया जाता था कि काला सा बड़ा गेट है जिसमें से मुर्गियों की आवाज़ और गंध आती है

मुर्गी पंडित की लाश कई दिनों तक उस घर में पड़ी सड़ रही होती
उनके पड़ोसियों ने उनका हालचाल न लेने के अपने तर्क विकसित कर लिए थे
लेकिन मुर्गियों और चूजों ने अपने इंसान न होने का फ़र्ज़ निभाया
और निकल आईं सैकड़ों की संख्या में अपनी आवाज़ में मर्सिया पढ़ती हुई
लहरतारा का वह मोहल्ला एक ऐतिहासिक दिन का गवाह बना
जब गलियों में आदमियों और कुत्तों से अधिक दिखी थीं मुर्गियां
जो चली जा रही थीं एक तरफ सर झुकाए
कतारबद्ध

मुर्गी पंडित का जाना प्रतिरोध की उस आखिरी कड़ी का टूटना था
जिससे बची थी उम्मीद
जहाँ से फूट सकती थी ज़िद की कोई अमरबेल
जो सही या गलत
अपनी पहचान से इतनी कस कर लिपट जाती
कि उसे बदलना किसी आंधी के बस के बाहर की बात होती

मुर्गी पंडित शुद्ध शाकाहारी थे
फूटे अण्डों से भरा उनका बरामदा जब साफ़ करवाया गया
तो उसी कीचड़ में उनकी भी परछाईं फूटी हुई मिली
जिसमें नमक का कुछ स्वाद था
मरने से पहले उन्होंने एक कड़ाही में अण्डों से कुछ बनाने की कोशिश की थी

पता नहीं खाने के लिए या मरने के लिए.  

विमल चंद्र पाण्डेय. 9820813904.