Wednesday, April 10, 2013

ब्रजेश कुमार पाण्डेय की ग़ज़लें.


  

बिहार के बक्सर जिले में जनमें ब्रजेश की पढ़ाई लिखाई वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय और बी.एच.यू से हुई हैं. साहित्य के बहुत अच्छे पाठक है और मेरे शुरूआती साथियों में सबसे पहले इन्होंने ही छपना शुरू किया, लेकिन लिखने की प्रवृति रहने के बाद भी लिखते कम हैं. हलाँकि इधर बीच इसमें तेजी आई है. हम आशा करते है कि यह तेजी अटूट हो. इनकी कविताएँ कथादेश, परिकथा, देशज, जनपथ सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. कविताएँ लीलाधर मंडलोई द्वारा संपादित किताब कविता का समय में भी शामिल. अचला शर्मा और सुधीश पचौरी की किताब "नए जनसंचार माध्यम और हिंदी" में बी.बी.सी के कार्यक्रमों पर समीक्षा प्रकाशित. प्रस्तुत है इनकी चार ग़ज़लें-  


   -एक-

अब तलक हमने किया क्या कुछ नहीं.
फिर भी पत्थर बोलते क्यों कुछ नहीं.

हादसे दर हादसे होते रहे
आपने कह दी अभी ये कुछ नहीं.

भूख भर रोटी नहीं दी आपने
और बोला बोलना है कुछ नहीं.

इस कदर नाराजगी न थी कभी
बोलते हर बात पे है कुछ नहीं.

आज तक है याद वो मंजर मुझे
सुबह थी पर दिख रहा था कुछ नहीं.

बिक रहा बाजार में सबकुछ यहाँ
और क्या मैंने  खरीदा कुछ नहीं.
 
शाम होने तक चला रास्ता मगर
खोलकर मुट्ठी जो देखा कुछ नहीं.

     -दो-

तुम चलो साथ तो कुछ बात बने.
कहने सुनने के कुछ हालात बने.

वो तो आते हैं चले जाते हैं,
कभी रुक जाएँ ऐसी रात बने.

मैं तो पीछे न मुड़ के देख सका,   
जिंदगी के यही हालात बने.

मेरे हिस्से की साँस लेने दे,
कुछ तो ऐसी ये कायनात बने.

हम तो तैयार थे मरने के लिए,
बेरहम क्यों तेरे जज्बात बने.

      -तीन-

वो चला जाये तो कैसा लगे.
फिर नहीं आए तो कैसा लगे.

आपनी ज़िद पर अड़े रहे हम भी,
दिन ये ढल जाये तो कैसा लगे.

आंखे उसने मुंदी हथेली से,
नाम न आए तो कैसा लगे.

जिंदगी मेरी तू दौड़ा मुझको,
और मिल जाये तो कैसा लगे.

बन चुकी उँगलियाँ अब हैं मुट्ठी,
कोई टकराए तो कैसा लगे.

-चार-

तेरे लिए ही हार गया मैं.
तुमने कहा बेकार गया मैं.

पाया खुद को बहुत अकेला,
जब–जब भी बाजार गया मैं.

पगडण्डी पर चला बहुत कम,
सड़कों पर सौ बार गया मैं.

कांटे चुभे पांव में हरदम,
अक्सर इस रफ़्तार गया मैं.

माँ ने जब भी मुझे बुलाया,
बेटा हूँ ना  यार ,गया मैं.

 ******
ब्रजेश से 09770556046 पर संपर्क किया जा सकता है.

  


Thursday, March 14, 2013

"ई इलहाब्बाद है भइया" : एक प्रतिबद्ध साहित्यकार की राह के मील के पत्थर




पाठक ही किसी रचना का पहला और अंतिम निकष हो सकता है, इस बात से थोड़ा कम इत्तेफाक रखा भी जाय क्योंकि थोड़ा कम से इस बात पर ज्यादा इत्तेफाक रखा भी नहीं जा सकता तो भी यहाँ यह कहने में गुरेज़ नहीं कि पाठक की प्रतिक्रिया किसी भी आलोचक से कमतर तो नहीं ही होती है. वैसे में यह कहना तब और मायने रखता है जब यहाँ रचना की कसौटी किसी लामबंदी और प्रायोजित चर्चा की शिकार रहती हैं. खैर इसके कोण कुछ और भी हो सकते है लेकिन विमल चंद्र पाण्डेय के नवीनतम संस्मरण ई इलहाब्बाद है भइया ( दखल प्रकाशन)  पर आनंद कुमार द्विवेदी की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय हैं. इसके साथ यह कहना भी खास है कि कम उम्र में संस्मरण लिखने के साहस से ज्यादा मानीखेज विमल का नजरिया और उनकी कलात्मकता है जो अपने परिवेश को देखने के लिए उकसाती है और हमारे यथार्थ की संरचना की परतें खोलती है. हलाँकि मैं इस संस्मरण का एक किरदार रहा हूँ और विमल हमारे दोस्त से ज्यादा दिलरूबा जैसा कुछ रहे हैं इसलिए इस पर कुछ कहने की बात दिलरूबा की बड़ाई जैसी लगती है फिर भी इतना कहने से नहीं बच रहा हूँ कि यह रचना एक क्लासिक फिक्शन का अहसास कराती है.



·         आनंद कुमार द्विवेदी           

                   ७ फरवरी २०१३ को दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में 'दखल प्रकाशन' के कार्यक्रम में जब विमल चंद्र पाण्डेय का संस्मरण "ई इलहाब्बाद है भइया"  हाथ में आया था तो दिमाग में यह विचार आया कि क्यों न विमल जी से पुस्तक पर उनके हस्ताक्षर ले लिये जाएँ, हस्ताक्षर करने के बाद उन्होंने कहा था कि कैसी लगी पढ़ के बताइयेगा  मैंने भी कहा था कि जी जरूर,  परन्तु यह ठीक वैसे ही था जैसे कोई आपसे पूछे 'और भाई क्या हाल-चाल' और आप बिना एक पल गँवाए कहें कि 'जी सब ठीक है मेहरबानी आपकी'। अपनी नियमित पढ़ने की आदत के बावजूद पूरी फरवरी पुस्तक छू नहीं पाया (अलबत्ता अजेय जी के कविता संग्रह और शम्भू यादव जी के कविता संग्रह की कुछ कवितायेँ पढ़ी भी थी जिनपर फिर कभी चर्चा करूँगा) और जब  पुस्तक हाथ आयी तो फिर छोड़ने का मन नहीं हुआ।

मैं न तो कोई साहित्यिक सितारा हूँ न हो कोई आलोचक एक सामान्य पाठक की भी एक नज़र होती है और मैं जो भी कह रहा हूँ वह सब उसी नज़र ने देखा है समझा है। मेरे अनुसार एक अच्छा संस्मरण वही है जब वह अपने काल-खंड (जिसकी स्मृति वह व्यक्त करता है) का समग्र चित्र प्रस्तुत करे उसमें व्यक्ति, विचार, देशकाल, समाज और साहित्य सभी न केवल मौजूद हों वरन उनका अनुपात भी ऐसा हो कि एक चीज़ की अधिकता पाठक को खटके नहीं ....और विमल जी का यह संस्मरण इन कसौटियों पर पूरी तरह खरा है।     

कथानक का प्रवाह ऐसा है कि एक बार आप इसको स्पर्श भर करें ये आपको अपने साथ बहा लेगा।  पत्रकारिता की जमीनी हकीक़त को परत दर परत खोलता हुआ संस्मरण जैसे ही थोड़ा सा आगे बढ़ता है आप से यह विस्मृत हो जाता है कि कि इसको लिखने वाला कौन है और रह जाता है तो बस सामने कथानक। मनुष्य की आदतों को देखते हुए विमल जी जिस बारीकी से उसके चरित्र की पड़ताल करते हैं वह अद्भुत है  उदाहरण के लिये ;
         "चाचा जी के घर में वह घर के मुखिया थे और इस बात को बहुत सीरियसली लेते थे । मेरे घर में मेरे पिताजी ठीकठाक लोकतान्त्रिक आदमी हैं और अखबार आने पर उनसे कोई भी सम्पादकीय पृष्ठ माँग सकता है -जब वह मुखपृष्ठ पढ़ रहे हों, जबकि चाचा जी के कब्जे से अखबार तब तक नहीं पाया जा सकता जब तक वह पूरा पढ़ न चुके हों "

लेखक की अपनी एक दृष्टि है और वह बड़ी सहजता से मगर बहुत गहरे तक अपने आसपास की हर चीज़ और घटना देखती है  जैसे कि ;

"प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बिकुल युवा और युवतर लोग जो विषय से प्यार करने की बजाय उस से लड़ते रहते हैं मेरे मन में कई कारणों से डर पैदा करते हैं"

अपने बछरावां (मेरे गृह जनपद रायबरेली का एक कस्बा)  के दिनों में यद्यपि मैं कुछ पत्रकारों के संपर्क में रहा हूँ मगर असल बात यह है कि पत्रकार नामक एक विशेष किस्म के प्राणी को मैं इस पुस्तक के माध्यम से ही समझ पाया हूँ विमल जी के ही शब्दों में ;

"मैंने उससे पूछा कि उसका अखबार कहाँ से निकलता है और वह क्या कवर करता है । उसने बताया कि वह सब कुछ कवर करता है । मैंने शक से उसकी ओर देखा और पूछा कि उसका अखबार किस भाषा का है । उसने 'द न्यूज क्रिटिक टाइम्स' अपनी जेब से निकाला, देवनागरी में लिखा हुआ यह नाम 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' को मात दे रहा था और सब कुछ कवर करने वाले इस पत्रकार ने चार पन्ने के अपने अखबार को चार बार मोड़ कर अपनी पिछली जेब में रखा था।"

" मुख्य तौर पर दो तरह के पत्रकार थे, एक तो, चार पन्ने वाले अखबारों और लोकल न्यूज चैनलों के , जिनमें से ज्यादातर के ईमेल आईडी भी नहीं थे और ईमेल जैसी फालतू चीजों के बारे में उनका रवैया तन्नी गुरू वाला हुआ करता था कि जिसको गरज होगी खुदै आएगा । सभी तो नहीं मगर इसमें ज्यादातर पत्रकार, पत्रकार वार्ताओं में मिलने वाले गिफ्ट पर अपनी नज़रें गड़ाए रहते, कुछ लोग खाने के मेन्यू को लेकर भी बहुत चिंतित रहते। जब किसी बड़ी कंपनी की प्रेस कांफ्रेंस में नामों के आगे हस्ताक्षर कराकर सिर्फ़ बड़े अखबारों या सेटेलाइट चैनलों के पत्रकारों को ही गिफ्ट दिए जाते और इन पत्रकारों के कार्ड देखने के बाद इनसे माफ़ी मांग ली जाती तो ये पत्रकार सारा दिन सुभाष चौराहे (जिसे पत्रकार चौराहा भी कहा जाता था ) पर यह कहते हुए निकाल देते की देश में अविश्वास का जो माहौल बन रहा है वह इसकी एकता और अखंडता के लिए भरी खतरा है।"...दूसरे तरह के पत्रकार अमरउजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे अखबारों के हुआ करते थे जिनमे ज्यादातर खाने के प्रति कोई रूचि नहीं दिखाते थे चाहे मेन्यू कितना भी अच्छा हो। इनके दोस्त तय थे, हाय हेलो करने वाले चेहरे तय थे, यहाँ तक कि इनके सवाल भी तय थे" ..... "मैंने ऐसे एकाध पत्रकारों से बात करने की कोशिश की थी लेकिन मेरा फिजिकल अपीयरेंस कुछ ऐसा था कि मैं बहुत ध्यान देने लायक आदमी नहीं दिखायी देता था और वे आमतौर पर पहली राय फिज़िकल अपीयरेंस को देख कर ही बनाते थे।" 

        विमल जी को मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूँ  जो कुछ भी जाना है इस संस्मरण के माध्यम से ही जाना है मगर उनमे एक विचार है और विशेष बात यह है कि उनका विचार शुरू से अंत तक कहीं दुराग्रह का शिकार नहीं होता। वो दूसरों की न समझ आने वाली बातों से असहमत होते हैं मगर उनसे चिढते नहीं उनके प्रति कोई गांठ नहीं रखते बल्कि अपनी बात कहते हैं और दूसरे की बात को तर्कों के आधार पर देखने की कोशिश करते हैं शायद यही कारण है कि इलाहाबाद में उनके जिक्र में संघ से जुड़े लोगों को भी स्थान मिला है वह भी बिना किसी झिझक और कृतिम दूरी के ...एक शानदार चुटकी देखिये :

     "मैं संघ की कार्यप्रणाली का भले विरोधी होऊं, वहाँ का स्वादिष्ट भोजन नहीं भूल सकता। जब भोजन सामने आता तो मेरे आसपास के सभी लोग श्रद्धा से हाथ जोड़कर मंत्र पढ़ते और मंत्र न जानने वाला मूढ़ बनकर बैठा उनके चेहरे को निहारता रहता। भोजन की थाली में पतली-पतली गर्म रोटियाँ होतीं जिनसे भाप निकलती रहती, एक कटोरी में दाल होती जिसके ऊपर घी की हलकी परत होती, एक तरफ बिना लहसुन प्याज की सात्विक सब्जी होती जिसमे देखने पर कतई पता नहीं चलता (और न ही खाने में) कि इसमें लहसुन प्याज की कमी है एक प्लेट में सलाद इतने सलीके से रखा होता कि उसे खाने से ज्यादा देखने का मन होता। यह भोजन मंत्र पढ़ा जाना डिजर्व करता था ... और जब वे लोग मंत्र पढ़ते तो मैं भी उनकी देखा देखी बुदबुदा लेता ताकि उन्हें मेरे मंत्र न आने और खाने पर मंत्रमुग्ध हो जाने का अंदाजा न लगे। "बहुत सही खाना मिला है आज बहुत दिनों के बाद" बुदबुदाने के बाद मैं उनकी देखा देखी खाने को बहुत संयम से खाता और मौका मिलते ही अपनी बग़ल में बैठे विवेक से कहता ;"साला की इतनी इच्छा तो चिकन भी नहीं जगाता जितना ये सात्विक खाना जगा रहा है।" विवेक फुसफुसाकर डपट देता, "साले ये शब्द न बोलो नहीं तो अगली बार से तुमको भगा दिया जाएगा।" मैं चुपचाप खाने लगता । मैंने एकाध बैठकें भी आधी अधूरी अटेंड  कीं मगर मुझे कुछ खास पता नहीं चला कि वे लोग मोटा-मोटी किस मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं । देश पर बात करते करते बात भोजन पर आ जाती और हर बार की बैठक में यही तय होता कि अगली बैठक का समय क्या होगा। मैंने इस बात की चर्चा वहाँ के लोगों से की कि आप लोग सिर्फ़ टाइम पास करते हैं तो किसी संघी ने मुझे एक दोहा सुनाया जो उसके हिसाब से संघ के बारे में बताता था ; किसने सुनाया था ये तो याद नहीं मगर दोहा कुछ यूँ था ,
"संघ के हैं तीन आयाम - भोजन, बैठक और विश्राम।"
मैं संघ के बारे में पहली बार किसी बात से शत-प्रतिशत सहमत हुआ।"
                                                                                                        
साहित्यिक पृष्ठभूमि और पेशे से पत्रकार होने की वजह से विमल जी के इस संस्मरण में भी ज्यादातर बातें और विचार इन्हीं दोनों क्षेत्रों पर केंद्रित हैं और बहुत सुखद लगा यह जानना कि वह साहित्य की आत्मप्रचार वाली शैली से दूर हैं अपनी उपलब्धियों पर इतराये नहीं बल्कि बहुत सहजता से लिया साहित्यकारों  के एक विशेष दुर्गुण आत्ममुग्धता को पहचाना और उससे बचे ।  इसका बहुत बड़ा श्रेय अगर  इलाहाबाद के  'मुखातिब' जैसे कार्यक्रमों को देने का अवसर आया तो कभी संकोच नहीं किया।

साहित्य के  अपने अनुभव लिखते हुए विमल जी कहते हैं "दरअसल अपने मन में एक असधारण छवि बनाकर मैं जिन कुछेक बड़े लेखकों से मिला था वो छवि बहुत बुरी तरीके से इसलिये टूटी थी कि ये बड़े लेखक अपनी असल जिंदगी में एक सामान्य इंसान तक नहीं रह गए थे । उनकी रचनाओं में उनके आसपास एक ऐसा अल्प-पारदर्शी मटमैले रंग का घेरा बना दिया था कि उन्हें अव्वल तो दुनिया दिखायी ही नहीं देती थी और कभी थोड़ी बहुत दिखती भी थी तो अपने रचनाओं के रंग की ही । ये दिन में १४ घंटे अपनी रचनाओं के बारे में ही बात करते और इस बात को बार-बार दोहराने से इसे खुद ही सत्य मान बैठे होते थे कि वे ही अपने समय के सबसे प्रतिभावान लेखक हैं ।"..............आत्ममुग्धता एक ऐसी बीमारी थी जिसके लक्षण शुरू-शुरू में एकदम पता नहीं चलते थे और अंतिम चरणों में पता चलने पर इसका इलाज़ दुर्भाग्य से मौजूद नहीं था। ...... अपनी रचनाओं के बारे में सोचना और उनपर बात करना बुरी बात नहीं है लेकिन उसके असर के बारे में जाने बिना खुद उसकी तारीफ में जुटे रहना, दुसरे सभी लेखकों को खुले मन से गरियाना, दुनियादारी के दख़ल से कटे रहकर सिर्फ लिखने को बड़ा महान  काम मानना, ये कुछ ऐसे दृश्य थे जो मन में जुगुप्सा पैदा करते थे उनकी संगति से लाख गुना बेहतर उनकी किताबें होती हैं और मैं पढ़ता रहा।"

'यारों के यार' (जी हाँ मैं बहुत सोच समझकर यारों के यार बोल रहा हूँ)  विमल जी का एक संस्मरण उस समय का जब उनको  नवलेखन का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की धोषणा हुई थी ;
"मेरे दोस्तों की रेंज़ बहुत बड़ी है और हर तरह के दोस्त मुझे बहुत अज़ीज़ हैं मुझे उस समय की मुख्यतः दो तरह की प्रतिक्रियाएं याद हैं ... दोस्तों के एक समूह ने पूछा,  'पैसा भी मिलेगा ?'
    मैंने कहा, हाँ, पचीस हज़ार रूपये मिलेंगे और मेरी पहली किताब भारतीय ज्ञानपीठ से छपकर आएगी।'
    प्रतिक्रिया - अबे किताब जाय गांड मराने, पचीस हज़ार रुपया ...! सोचो कितने दिन तुम पार्टी दे सकते हो बहुत सही गुरु।'
दुसरे समूह ने पूछा, 'किताब भी छपेगी न ?' 
मैंने कहाँ, 'हाँ, किताब भी छपेगी और पचीस हज़ार रूपये भी मिलेंगें।'     
प्रतिक्रिया - 'अरे महराज पैसे वैसे को गोली मारिये, ज्ञानपीठ से पहली किताब का मतलब समझ रहे हैं ? बहुत बधाई हो !"

    अगर मैं इस किताब की अपनी पसंदीदा बातें लिखने लगूंगा तो लगभग मुझे सारी की सारी किताब ही यहाँ लिखनी पड़ जायेगी इलाहाबाद के हर महत्वपूर्ण अंग की आंतरिक झांकियां हैं इसमें, इलाहाबाद के वकील (बाप रे)  वहां की 'बकैती' और माघ मेला  ..... माघ मेला कैसे इलाहाबाद के लिए एक अवसर लेकर आता है ...बाबाओं के प्रचार-प्रसार की भूख और उनका फायदा उठाते पत्रकार, कल्पवासियों की स्थिति और  उस समयावधि के लिए विशेषरूप से उग आई संस्थाएं कैसे सबका शोषण करती हैं  आदि-आदि !

  मेरा मन कर रहा है की मैं और बहुत कुछ लिखूं  मगर विवेक कह रहा है की अब मुझे अपनी बात समाप्त कर देनी चाहिए ...मगर बंद करने से पहले एक व्यक्ति के रूप में विमल जी के सबसे नाज़ुक हिस्से 'प्रेम' को न देखा जाए तो शायद यह उनके साथ नाइंसाफ़ी होगी ......
     "सपनों के उस सफ़र की उम्र बहुत कम थी और मैं अपनी खुशियों के साथ जितने दिन भी रहा, वे मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे। मैं उसके शहर जाता और हम साथ-साथ बादलों पर घूमते ...उसका शहर उसकी ही तरह खूबसूरत था और वहाँ के बादल बहुत पास होते। कुछ तो इतने नज़दीक कि आँखों में उतर आते। मैं उन दिनों बहुत जल्दी रो पड़ता था उसने मुझे बिलकुल अपने जैसा कर लिया था"
विमल जी ये अंतिम पंक्तियाँ मेरी हैं बेशक आपने लिखी हों.

अंत में 'दखल प्रकाशन' को अपने प्रवेश के साथ ही इतनी बेहतरीन कृति समाज को देने के लिये दिल से आभार !


Tuesday, January 29, 2013

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की राजनीति


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हर साल भारत रंग महोत्वसव के दौरान पाकिस्तान शिरकत करता रहा है. लेकिन इस बार भारत पाकिस्तान के रिश्तों में आई कड़वाहट की वजह से पाकिस्तान के अजोका थियेटर द्वारा किया जाने वाला नाटक मंटोरामा को स्थगित कर दिया गया. इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति को लेकर युवा लेखिका मंजरी श्रीवास्तव ने वरिष्ठ लेखक मुशर्रफ़ आलम जौकी से जो बात चीत की हैं वो प्रस्तुत है- 

मंजरी श्रीवास्तव: लगभग हर वर्ष भारत रंग महोत्सव में पाकिस्तान शिरकत करता था. इस वर्ष भी राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव ने मंटो जन्म शताब्दी मनाने का ऐलान किया था. पर पाकिस्तान के अजोका थिएटर ग्रुप द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले नाटक 'मंटोरामा' के अचानक स्थगित कर दिए जाने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?

मुशर्रफ़ आलम ज़ौकी: ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है.२६/११ के समय भी जब कसाब अपने आतंकवादी दोस्तों के साथ मुंबई में आतंक फैलाने के इरादे से आया था, उस समय भी पाकिस्तानी कलाकार वापस भेज दिए गए थे. भारत में ऐसा पहले भी होता रहा है कि भारत पाक-संबंधों को देखते हुए शिवसेना और मनसे जैसे कई संगठन एक घिनौनी राजनीति की शुरुआत कर देते हैं. यह वास्तविकता है कि आरम्भ से ही पाकिस्तान की मंशा भारत को लेकर ठीक नहीं रही है. १९६५ और १९७१ के युद्ध इसके उदाहरण भी हैं. इसके बाद भी राजनीतिक परिस्थितियों में पाकिस्तान मौक़े-बेमौक़े अपनी सीमा लांघते हुए ऐसे हमले करता रहा है. लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण मुद्दा यह उभरता है कि राजनीति और साहित्य का क्या सरोकार है.राजनीति तोडती है और साहित्य जोड़ता है. कला और साहित्य का मामला राजनीति से बिलकुल अलग और उलट होता है. मैं इस मामले में मदीहा का समर्थन करता हूँ. मदीहा ने एनएसडी को लताड़ते हुए बिलकुल सही कहा है कि- "यह कैसा हिन्दुस्तान है. अपना लोकतंत्र का बिल्ला टॉयलेट में फ्लश कर दीजिए. नफ़रत फैलाने वाले मुट्ठी भर लोगों के सामने पाकिस्तानी हुकूमत घुटने टेक देती है. आपने भी वही किया. अब मत कहियेगा की हम शरीफ़ लोग हैं.और यह फ़िलॉसफी तो बिलकुल भी नहीं चलेगी की मंटो जितने पाकिस्तान के हैं, उतने ही हिन्दुस्तान के.इस बार का महोत्सव मंटो पर केन्द्रित है और 'मंटोरामा' का ही मंचन नहीं हुआ.ख़ैर, इस फ़ैसले पर कोई ऐतराज़ नहीं कर हम कलाकारों की बची-खुची इज्ज़त एनएसडी ने उतार डी. ख़ाक में मिला दो ऐसा रंगमंच जहाँ मामूली फ़रमान से तुम कलाकारों की पतलून सरकने लगती है." यह हमारे साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास का दुर्भाग्य है कि मंटो और इक़बाल जैसे बड़े दानिशवर और साहित्यकारों के साथ भी राजनीति का खेल खेला गया. यहाँ मंटो से पहले मैं इक़बाल का भी मुद्दा उठाना चाहूंगा जिनकी मृत्यु १९३८ में हो गई लेकिन उन्हें पाकिस्तानी साहित्याकार घोषित किया गया. आप देखें तो उस समय हिन्दू-मुस्लिम का अंतर इस हद तक बढ़ चुका था कि शेख अब्दुल्लाह जैसे लोगों को भी यह कहना पड़ा था कि जो क़ौम हमारे हाथ से एक गिलास पानी नहीं ले सकती है वो हमें हमारा अधिकार कैसे दे सकती है. उस समय ऐसी मानसिकता इक़बाल जैसे बहुत से मुसलमानों की थी जो विभाजन के बाद भी यहीं रह गए.कहने का तात्पर्य यह है कि यह इक़बाल जैसों का केवल एक क्षणिक अनुभव था. आज़ादी से नौ साल पहले मरने वाले इक़बाल को पाकिस्तानी नहीं कहा जा सकता मगर हमारी राजनीति की घिनौनी परंपरा ने इक़बाल जैसे महान कवि और दार्शनिक को पाकिस्तान की झोली में डाल दिया. इसी तरह, सारा जीवन भारत में रहने वाले और जीवन के केवल सात साल पाकिस्तान में गुज़ारने वाले मंटो को भी यहाँ की राजनीति ने पाकिस्तान को सौंप दिया. मदीहा ठीक कहती हैं कि अगर उनके जाने के बाद एनएसडी यह ड्रामा करती है कि मंटो हिन्दुस्तानी हैं तो फिर एनएसडी ने मंटो पर नाटक का प्रदर्शन करने से मना क्यों किया ? मैं एक बात और भी बताता चलूँ कि मैं मंटो को सदा से हिन्दुस्तानी मानता आया हूँ और मैंने इस विषय पर काफ़ी पहले एक लेख भी लिखा था. मंटो पत्नी के जोर देने पर ज़बरदस्ती पाकिस्तान गए लेकिन वहां जाकर भी मंटो एक पल के लिए भी स्वयं को भारत से काट नहीं सके.जैसे, एक जगह मंटो लिखते हैं:-"आज मेरा दिल उदास है.चार-साढ़े चार बरस पहले जब मैंने अपने दूसरे वतन बम्बई को छोड़ा था तो मेरा दिल इसी तरह दुखी था. मुझे वो जगह छोड़ने का सदमा था जहाँ मैंने ज़िन्दगी के सबसे हसीं दिन गुज़ारे थे."  इसी तरह मंटो एक जगह और लिखते हैं:-"मैं यहाँ पाकिस्तान में मौजूद हूँ लेकिन मैं चलता-फिरता बम्बई हूँ. मैं कहीं भी जाऊंगा बम्बई में ही रहूँगा."
बहुत आसानी से मंटो के उस दर्द को समझा जा सकता है कि मंटो ने विभाजन को कबूल ही नहीं किया. एक तो इसका सटीक उदाहरण 'टोबा टेक सिंह' है और 'यज़ीद' जैसी कहानियाँ हैं. इन कहानियों के सन्दर्भ में आसानी से कहा जा सकता है कि मदीहा ने भारत सरकार पर जो गुस्सा ज़ाहिर किया है वह एक रंगकर्मी और कलाकार का गुस्सा है और वह जायज़ है. देखा जाए तो इस तरह के मामले में केवल दो देशों की घिनौनी राजनीति ही होती है. पाकिस्तान के पहले आक्रमण के साथ जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने फेसबुक पर अपने सन्देश में लिखा कि कहीं ऐसा तो नहीं की ये दोनों देशों की अपनी-अपनी समस्याओं से निपटने की एक चाल हो क्योंकि जब भी दोनों देश गृहयुद्ध में उलझते हैं तो बाक़ी सारी समस्याएं हाशिए पर चली जातीं हैं. ये सच हो, तब भी, इस मामले में राजनीति की वकालत नहीं की जा सकती. कला और संस्कृति को आज़ाद होने का हक़ हासिल है. यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए की अंकुश या दबाव जहाँ एक घृणित राजनीति के आईने में आप किसी भी देश के कलाकार का अपमान कर रहे हों. मेरी मानें तो ये मशहूर रंगकर्मी मदीहा गौहर से ज्यादा मंटो का अपमान है और देश चलाने वालों को यह अच्छी तरह से याद रखना चाहिए कि अभी हम मंटो जैसे साहित्यकारों के अपमान का बोझ उठाने को तैयार नहीं हैं.  

मंजरी श्रीवास्तव: मदीहा के समर्थन में भारतीय साहित्यकारों और रंगकर्मियों के सामने आने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?


मुशर्रफ़ आलम ज़ौकी: साहित्य, भाषा और देश की दीवारों से कहीं अलग है. इसलिए ऐसे हर मुद्दे पर साहित्यकारों और रंगकर्मियों द्वारा आवाज़ बुलंद करना ही एकमात्र विकल्प है. हम एक ऐसी घृणित या बदलापूर्ण संस्कृति में जी रहे हैं जहाँ ईंट का जवाब पत्थर से देने की आदत पड़ चुकी है. बाबरी मस्जिद पर हमला हुआ तो पाकिस्तान और बांग्लादेश के मंदिर भी तोड़ डाले गए. यह एक राजनीतिक रद्देअमल था. लेकिन इसी का दूसरा पहलू है कि मदीहा गौहर समेत तमाम बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों ने खुलकर अखबारों में मंदिरों को तोड़े जाने का विरोध किया. मीडिया केवल नेगेटिव समाचार को ही पहुंचाने तक सीमित हो गया है.लेकिन यह अच्छी शुरुआत है कि मदीहा को लेकर पत्र-पत्रिकाओं और फेसबुक आदि पर भी नाराजगी व्यक्त करने और मदीहा के समर्थन में बयानात की क़तार लग गई है. लेकिन इन सब के पीछे एनएसडी  की कलाई खुल कर सामने गई है. भारत रंग महोत्सव जैसे आयोजनों में भी इतनी घटिया राजनीति की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. जहाँ इतने सारे रंगकर्मी मौजूद हों वहां बहुत आसानी से मंटो की आवाज़ सारी दुनिया को सुनाई जा सकती थी.नाटक एक बड़ा माध्यम है और यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि मंटोरामा आज के समय के लिहाज़ से रंगमंच की ज़रूरतों को देखते हुए एक बड़ा और सार्थक कदम है क्योंकि मंटो अपने समय में भी उतने ही सार्थक थे जितने आज. उस समय भी मंटो जैसी कोई आवाज़ नहीं थी और आज भी स्वाधीनता के ६७ वर्ष बाद ऐसी कोई आवाज़ नहीं जो एक बड़ी क्रांति का स्वर बन सके. देश की राजनीति से ज़्यादा  एनएसडी ने जिस कायरता का परिचय दिया है उसके लिए माफ़ी एक छोटा-सा शब्द है. इस कदम ने भारत रंग महोत्सव की भूमिका को भी एक नकारात्मक भूमिका बना दिया है. इस सन्दर्भ में यह बात भी बेहद अहम् है कि यदि सरकारी फरमान होते तो इस नाटक का मंचन सरकार की ख़िलाफ़त करके कहीं नहीं करवाया जा सकता था. बाद में अक्षरा थिएटर में इसका सफल मंचन कराया गया. इससे यह पता चलता है कि यह एनएसडी की अपनी सोची-समझी राजनीति थी.  

मंजरी श्रीवास्तव: इससे भारत-पाक संबंधों पर क्या असर पड़ेगा ?

मुशर्रफ़ आलम ज़ौकी: पाकिस्तान के जंगग्रुप और भारत के टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा चलाये जा रहे 'अमन की आशा' की आशाएं भी इस तरह की वारदातों से धूमिल हो जाती हैं.  यहाँ यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत और पाकिस्तान की जनता में से कोई भी जंग नहीं चाहता. साहित्यकार बिरादरी या रंगकर्मी आमतौर पर इस बात के इच्छुक होते हैं कि कैसे दोनों देशों के रिश्तों को मधुर बनाया जाए. मगर होता क्या है. सारी कार्यवाई एक तरफ़ हो जाती है और नफ़रत की राजनीति इन सब पर भारी पड़ती है. पाकिस्तान में अभी हाल में कादरी समर्थकों का हंगामा इसी सिलसिले की एक कड़ी था. भ्रष्टाचार में डूबी हुई सरकार को उबारने के लिए पाकिस्तानियों ने कादरी में भारतीय अन्ना हज़ारे को देखा. दरअसल भ्रष्ट राजनीती के पीछे छिपी नफ़रत की भाषा को दोनों देशों की अवाम अच्छी तरह समझती है. दिल्ली गैंग रेप का मामला हो या भ्रष्टाचार का राक्षस, किसी भी तरह के आन्दोलन में साहित्य और कलाकारों की अपनी भूमिका रही है. साहित्य हमेशा से आज़ाद रहा है. अभी हाल में सन २०१२ में पाकिस्तान के ख़ालिद तूर का एक उपन्यास "बालों का गुच्छा" सामने आया. "बालों का गुच्छा" उस पाकिस्तानी राजनीति को बेनक़ाब करता है जहाँ सरकार के पीछे मौलवियों और ठगों जैसे तांत्रिकों और फ़कीरों का हाथ है, इन्हीं के पास असल सत्ता है. लेकिन, यहाँ ख़ालिद तूर कश्मीर के बारे में अपनी राय स्पष्ट करना नहीं भूलते-

१९४७ में शुमाली इलाकों के अवाम की अक्सरियत कश्मीर के साथ रहना चाहती थी. अवाम में यह प्रोपगंडा किया गया कि जो बग़ावत हो रही है वह महाराजा के ख़िलाफ़ है. अगर अवाम तक ये सच्चाई पहुँच जाती कि महाराजा ख़तम हो चुका है  और कश्मीर अब हिन्दुस्तान का हिस्सा है तो सिपाही बग़ावत में हिस्सा लेते अवाम क्योंकि सब कश्मीर में ही रहना चाहते थे."
                                                                                                                                                                                                                         (पृष्ठ संख्या-५२, बालों का गुच्छा)

७५ वर्षीय एक पाकिस्तानी साहित्यकार खुलकर कश्मीर के बारे में एक वक्तव्य दे रहा है जो बहुत कुछ हिन्दुस्तान के पक्ष में जाता है. ये भी आज़ादी का संकेत है और कहना चाहिए कि पाकिस्तान को ये साहित्यिक आज़ादी अब जाकर मिली है लेकिन क्या हमारे यहाँ किसी उर्दू-हिंदी साहित्यकार ने कश्मीर पर खुलकर अपने वक्तव्य को स्पष्ट करना चाहा ? मेरा उत्तर है - नहीं. रिश्तों को सुन्दर बनाने के लिए कश्मीर जैसी समस्या का समाधान भी आवश्यक है. पाकिस्तानी लेखक भी स्वीकार करते हैं कि ये मामला इतना तूल नहीं है जितना तूलानी बना दिया गया है और इसके पीछे भी दोनों देशों की अपनी-अपनी राजनीति है. कुल मिलकर मदीहा के सन्दर्भ में देखते हुए स्थिति निराशाजनक ही नज़र आती है. अब ऐसे मुद्दों पर ख़ामोश रहने की ज़रुरत नहीं है, बल्कि साहित्यिक आन्दोलन को मज़बूत करने की ज़रुरत है जहाँ भ्रष्ट राजनीति के विरोध में संबंधों को मधुर बनाने के प्रयास किए जाएँ.रास्ता तभी निकलेगा


 मंजरी श्रीवास्तव

·        हिंदी कविता का एक सशक्त हस्ताक्षर 
·         हिंदी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित,
·        एक लम्बी कविता "एक बार फिर नाचो इज़ाडोरा " पुस्तिका के रूप में प्रकाशित
·        साहित्य अकादेमी, अकादेमी ऑफ़ फाईन आर्ट्स एवं लिटरेचर, आकाशवाणी, दूरदर्शन तथा कई महत्वपूर्ण मंचों से कविता पाठ
·        मराठी एवं बांग्ला में ख़लील जिब्रान एवं अन्य कई कविताओं का अनुवाद.
·        पहला काव्य संग्रह- “पहली बारिश का मंज़रनामा शीघ्र प्रकाश्य 
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