Sunday, February 15, 2015

रेणु मिश्रा की प्रेम कविताएँ.

रेणु मिश्रा की कविताओं में प्रेम के उजले पक्ष हैं. प्रेम के प्रति प्रतिबद्धताएँ जैसे ज़िंदगी को एक उम्मीद  से भर देती हैं, कुछ वैसे ही इनकी प्रेम कविताएँ इनकी  सतत रचनात्मकता को एक उम्मीद से भर रही हैं. जनराह इन्हें अनंत शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत कर रहा हैं. आशा है आप अपनी राय से अवगत कराएँगे. 




1. तुम्हारे कमरे का मेरा सामान

आज तुम्हारे कमरे मे गयी थी
चुपके से, ठहरे पानी सी
और हवा की तरह ले आई
अपने संग हर वो बात
जो ज़िंदगी के लिए ज़रूरी थी

हाँ
ले आई बिस्तर के सिरहाने से
कॉफी के, दो खाली मग
कड़वाहटों को तलहटी मे छोड़
जिनके संग गुज़ारा था
प्यार भरी चुसकियों का मीठा वक़्त

अरे!! वक़्त से याद आया
ले आई फ़ोटोफ्रेम से
मुस्की वाला, वक़्त का क़तरा
जो लम्हों की सूई से ठोकर खा 
वहीं था पड़ा, पतझड़ सा बिखरा
यादों के चिलमन से जो
धूप थी छन के आई
तो उससे लग रहा था
वो कितना उजला निखरा

लो!! उजले से याद आया
ले आई उजले से दिन और
चमकीली रातों वाला कलेण्डर
जिनमे बातें थी उन मौसमों की
जहाँ दिन खिलते थे चंपई से
और रातें महकती थी जैसे लैवेंडर।

अब!! ख़ुशबू की बात कैसे भूलूँ
ले आई तुम्हारी अलमारी से
झाँकता हुआ अपना हरा दुपट्टा
जो तुम्हारी ख़ुशबू से था तरा
और तुम्हारे प्यार को सीने से लगाए
बरसों से था वहीं पड़ा 

गुस्ताख़ी माफ़ हो, तुम्हें बताया नहीं
कि मैं कब आई मैं कब गयी
पर शायद तुमने मेरे लिए ही इन्हे
इतने दिनों से सहेज रखा था
ले आई
तुम्हारे कमरे का वो मेरा सामान
जो मेरी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी था...!


2. इतने जुदा हैं क्यों

कैसा होता है ना
हम कितने अलग
कितने जुदा होते हैं
हमारा एक दूसरे से  
कुछ भी तो नही मिलता
ना शक्ल ना सूरत
ना हसरत ना फितरत
ना बात करने का तरीका
ना ज़िंदगी जीने का सलीका
हम होते हैं बिलकुल
अलग अलग दुनिया के मालिक
जुदा नगर के बाशिंदे
मगर फिर भी
ये शब हो या सहर 
या फिर हो दोपहर का पहर
सब की ज़िंदगी के पहलू
लगभग एक जैसे ही होते हैं
बंद आँखों मे तैरते सपने हों
या खुली पलकों की तन्हाइयाँ
तेज़ धडकनों की बेचैनियाँ हों
या जिस्म की मद्धम रवानियाँ
कहाँ फ़र्क होता है, इन्हे महसूसने मे
जो सरसराहट तुम मे तैर जाती है
मुझे पल भर को सोचने मे 
बिलकुल वैसी ही बिजली
कौंध जाती है मुझमे
तुम्हारे नाज़ुक खयाल को समेटने मे
फिर भी हम एक दूसरे से
हम-खयाल नहीं होते
बने रहना चाहते हैं
अलग अलग मुल्क के हुक्मरान
अपनी अपनी सरहदों के साथ
अपने ज़र्रे-आकाश को समेटे
अपनी सादगी छोड़ अपने अना के साथ !


3. क्यूँ याद आते हैं

कभी कभी कुछ लोग,
जाने क्यूँ ऐसे याद आते हैं

जैसे साँसों का बिना बताए
लेना और छोड़ना
या
यादों की चहल-कदमी मे  
गिरना और संभलना

जैसे किन्ही प्यारी बातों का
बनना और बिगड़ना
या 
किसी पुराने ज़ख्म का
फिर से हरा होना और दुखना

जैसे किताबों की रैक का
कोई छूटा हुआ सा कोना
या
उससे नीचे गिरी किताब का
एक मुड़ा हुआ सा पन्ना

जैसे आसमा की थाली से  
कोई टूटा तारा चुनना
या 
उम्मीद के दामन से गिर के 
मांगी हुई दुआ का खोना !
4. खामोशी.
एक ख़ामोशी तेरे मेरे बीच कायम है
शायद
इक लम्हे से
इक मौसम से
या यूं कहें
इक अरसे से
काश !
नज़रें मिलें
पलकें भीगें
या यूं कहें
बिन कहे-सुने...
शिकवे धुल जाएँ'!!

5. मुस्कान की वजह

तुम्हारे जाने के बाद
खाली मर्तबान से पड़े दिन में
उदासी भर आई थी
सोचती हूँ
ज्यादा दिन ऐसे रहे तो
उनमे नमी जम जायेगी
फिर कुछ और दिन 
वो ऐसे पड़े रहे तो
उनमे तुम्हारे प्यार के 
छोटे छोटे फंगस उग आयेंगे
फिर वही फंगस
कीट-पतंगों, झींगुरों में बदल
तुम्हारी यादों के जंगल में जा
कभी झांय झांय शोर मचायेंगे
तो कभी टिमटिमाते जुगनू बन
मेरी इंतज़ार भरी रात को
जगमग कर जायेंगे
तुम सोचते थे
तुम्हारे जाने के बाद 
मैं अकेली रह जाऊँगी
लो देख लो
तुम्हारा, मुझे छोड़ के जाना 
बेवजह रह गया
और खाली मर्तबान वाला उदास दिन
मेरे मुस्कराहट की वजह बन गया !!

6. खयाल तुम्हारा

समंदर के लहरों सा
तुम्हारा ख़याल
कैसे रोकूँ उन्हे
मन के साहिल पर आने से। 
पर क्या जानते हो?
पलकों की डिबिया मे
जो छुपा रखे हैं 
प्यार के मोती
वो कितने खर्च हो जाते हैं
बस तुम्हारे याद आने से।
इसके पहले कि
दिन-रात के कारोबार
खतम कर
मैं रीता हो जाऊँ
तुम छोड़ के ये दुनियादारी
आ जाओ किसी बहाने से


 परिचय : 
** मई 2010 में “लम्हों के मुसाफ़िर” (www.renu-mishra.blogspot.in) के नाम से शुरू कि‍या गया ब्‍लाग काफी चर्चित है।
 
**  2011 से अब तक “स्वर कम्युनिकेशन्स प्रा.लिमिटेड” के साथ क्वालिटी कंट्रोलर (हिन्दी भाषा) के तौर पर जुड़ाव  
** देश-विदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं व विविध विषयों पर आलेखों का नियमित प्रकाशन
** दिसंबर 2013 मे “विरहगीतिका” नामक साझा काव्य संग्रह प्रकाशित
** जानी मानी महिलाओं की पत्रिका बिंदिया मे कविताओं का प्रकाशन 
** जुलाई 2014 मे “धूप के रंग” नाम से नया साझा काव्य संग्रह प्रकाशित
संप्रति:- स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन कार्य
मोबाइल नं :- +919598604369
ईमेल आईडी:- remi.mishra@gmail.com

Tuesday, January 13, 2015

अशक्त आत्मस्वीकृतियाँ


विमल की कविताओं में समकाल के स्केच बहुतेरे मिलते हैं.  इन स्केचों का आयाम  समय के बहु कोणों से टकराते हुए ज़िंदगी की तल्ख सच्चाईयों में अपनी बुनावट करते हैं. यहीं वजह है कि विमल की कविताएँ अपने समकाल के यथार्थ से जब परिचित कराती हैं तो लगता है कि वे सिर्फ़ परिचय ही नहीं कराती, एक इतिहास सृजित करती हैं. विमल यह इतिहास भविष्य के लिए नहीं वर्तमान के लिए लिखते हैं. यहाँ ये कहना अजीब लगता है लेकिन विमल की संवेदानाएँ यथार्थ और निज से इतनी भिड़ती है कि सुबह और शाम के बीच सैकड़ों साल का अंतर दिखने लगता है. इसलिए विमल के स्केच अपने कहन में समय की कुरूपताओं का जितना बयान करे, जीवन की तलाश और उसकी प्यास को पाने की चाह  से उनमें एक अलग तेवर नज़र आता है और विमल इन्हीं खासियतों से अपने पास ठहरा लेते हैं. प्रस्तुत है विमल की नई लम्बी कविता  "अशक्त आत्मस्वीकृतियाँ". आशा है आप अपनी राय से अवगत कराएंगे. 




अशक्त आत्मस्वीकृतियाँ

सड़कों पर घमासान है
मन में ट्रैफिक जाम
बहुत सारे काम हैं
बिना रोज़गार व्यस्त हूं
कहने को मस्त हूं

ÛÛ

कंकड़ों से बचने के लिये पहनता हूं जूते
ठंडी हवाओं से बचाता हूं खुद को शाल ओढ़कर
मच्छरों से बचने के लिये लगाता हूं मच्छरदानी
दुखों से बचने के लिये नहीं खोज पाया कोई कवच अब तक
जिसके झूठे आश्वासन लगातार देता आ रहा हूं पत्नी और बच्चों को
मैं फूटने के कगार पर पहुंचे घाव से इस समय में
उस घाव के भीतर की पीब हूं
स्वाद कलिकाओं के मरने के बाद
आग उगलती हुयी जीभ हूं

ÛÛ

हर इच्छा को रोक रहा हूं एक रेशमी दिन के लिये
नहीं पता उसका अस्तित्व है या नहीं
पर उस दिन बिना किसी चिंता के खर्च कर सकूंगा
बिना किसी बहाने के ख़ुश हो सकूंगा
बेटी के लिये ख़रीद सकूंगा मनचाहे शौक
अभी तो उसकी इच्छाएं उसी अनिश्चित दिन के लिये टाल रहा हूं
जीजिविषा को मुफ़लिसी की चलनी से चाल रहा हूं

ÛÛ

महीने के आखिरी दिनों में उधार ले रहा हूं
शुरूआती दिनों में चुका रहा हूं ताकि फिर से मांग सकूं
इन दोनों के बीच मैं एक अनुशासित कर्ज़दार
उम्मीदों का सरौता ले भीगी सुपारी से दिन काट रहा हूं
समंदर सी प्यास है और ओस चाट रहा हूं
ÛÛ

कोई किताबें लिखने में व्यस्त है
कोई उन्हें न पढ़ कर
कोई बना रहा है उपलब्धियों के पहाड़
कोई उन्हें न चढ़ कर
कोई फोन पर लगातार लोन देने को व्यग्र
किताबें, पुरस्कार, लोकार्पण, रचनावलियां, समग्र
मैं एक लालची समय का गुमनाम लेखक
पैंतीस की उम्र में पैंसठ सा अशक्त हूं
मैं एनीमिया के दिनों में अपनी शिराओं में दौड़ता हुआ रक्त हूं

ÛÛ

पूरब से चल रही है हवा
मेरे जोड़ों में दर्द वृद्धों सा
शरीर कमज़ोर है मगर रीढ़ की हड्डी सीधी है बिना किसी प्रयास
इस बात से हर्ष होता है अनायास
इस समझौतापूर्ण समय का जहां दिन का रात से और चुप्पी का बात से समझौता है
मैं एक भीषण प्रतिवाद हूं
कवियों में अपवाद हूं

ÛÛ

कब्ज़ की समस्या विकराल है देश में
घृणा आ रही है वैरागी वेष में
मैं नास्तिक होकर महसूस रहा हूं नदियों पहाड़ों और चहचहाती चिडि़यों का सौंदर्य
कोई आस्तिक लगातार उगल रहा है नफ़रत का ज़हर
उसकी भंगिमाओं से आभास हो रहा है भयानक कब्ज़ का
देश की डूबती नब्ज़ का
वह धीरे-धीरे मनुष्य से सूखे मल में परिवर्तित हो रहा है
पेट एक बार पूरी तरह साफ हो जाये, सबसे बड़ी हसरत है
देश को एनीमा की सख्त ज़रूरत है

ÛÛ

मैंने घर बनवायेगाडि़यां खरीदीं
देह को सजाया दुनिया के सबसे महंगे वस्त्रों से
कंधों को सुसज्जित किया आग्नेय अस्त्रों से
व्यस्त रहा
अपने ही वैभव पर आसक्त रहा
मैंने जीवन के खेत में स्वयं का एक बिजूका खड़ा किया
खुद निकल पड़ा अनश्चित यात्राओं पर
लौटा तो बिजूका मेरी पत्नी से सहवास कर रहा था
उसने मुझे देखते ही बत्तियां बुझा दीं
जिन भी रास्तों पर चला उनका गंतव्य अस्पष्ट था
इस धोखेबाज समय में
जीवन को किसी भी तरह से जीना कष्ट था

ÛÛ

सब बंधे थे नियमों से
इतने ज़्यादा कि मैं नियम तोड़ नहीं लगा सकता था किसी को रंग
खुश होने के लिये एक अदद त्योहार की ज़रूरत थी
प्रेम करने के लिये एक खास दिन की
मुझे उन दिनों में न प्रेम करने की इच्छा हुई न पटाके छुड़ाने की
सब गले मिल रहे थे और कर रहे थे प्रकाश
रंगों से जब धुल रही थी दसों दिशाएं
मैं अंधेरे में बैठा अपनी आत्मा पर लगे मैल छुड़ा रहा था
मुझे बाहर निराशावादी कहा गया
घर में फसादी पहले से कहा ही जाता था

ÛÛ

जब मैंने जाना कि जीवन सबसे मूल्यवान चीज़ है
और इसकी सार्थकता इसे एकमात्र समझते हुये जीने में हैं
मैं भागता हुआ सबके पास एक ही बात कहने गया
वही बात जो इतनी ज़रूरी है कि बिना किसी तर्क
कविता में बिल्कुल एक ही तरह लगातार दो बार कही जा सकती है
जीवन सबसे मूल्यवान चीज़ है    
जीवन सबसे मूल्यवान चीज़ है
नौकरी से ज़्यादा, द्रव्य से ज़्यादा, द्रव्यमान से ज़्यादा
देश से ज़्यादा, धर्म से ज़्यादा, भगवान से ज़्यादा
आश्चर्य मुझे इस बात का नहीं कि लोग मेरी बात सुनते नहीं थे
आश्चर्य यह कि मेरी बात सुन कर आंखें झपकाते वह कहते
“यह बात तो हम जानते ही हैं”

ÛÛ

एक निर्दयी युद्धक्षेत्र में लेकर पुराने पड़ चुके हथियार उतरा हूं
आत्मविश्वास ऐसा जैसे पहले भी कई बार उतरा हूं
जीतने की जि़द है मेरी और आत्मसमर्पण में विश्वास नहीं करता
नये और अब नैतिक बन चुके हथियारों को न थामने की प्रतिज्ञा तो नहीं पर इरादा है
उस जीत तक के सफ़र में हंसता हुआ सारे संघर्ष जी रहा हूं
किस्मत को नहीं मानता पर उस पर थिगलियां सी रहा हूं
रोज़ कुंआं खोद रहा हूं और पानी पी रहा हूं

ÛÛ

प्रेम के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थी मुद्राएं
मुद्राएं कमाने की दौड़ में प्रेम कहीं पीछे छूट जाता था
दोनों को संभालने में उम्र का संतुलन गड़बड़ा जाता था
एक किशोर अचानक खुद को पैंतीस का पाता था और हड़बड़ा जाता था
समय हमेशा से 24 घंटो के मात्रक में चलता था
रात को इसमें से कुछ कम घंटे मिले थे लेकिन उसमें गाढ़ापन ज़्यादा था
रात दिन धरती आसमान समुद्र आम चुम्बन
कई असबाब बिना किसी अविष्कार की जद्दोजहद के हमें यूं ही मिल गये थे
सिर्फ़ एक कलम आंगन में रोप देने पर एक सुबह गुलाब के जखीरे खिल गये थे
आती जाती सांसों पर कोई ध्यान नहीं देता था जैसे यह खैरात में मिली चीज़ हो
कुछ इसे उधार में मांग कर लाये गये जीवन की तरह
जी जाते थे बिना कोशिश बिना मोह
कुछ इससे इतना प्रेम करते थे कि मर जाते थे

ÛÛ

“दुनिया के तेल पर अमेरिका की नज़र है”
दुनिया के प्रेम पर जाने किसकी
भयावह यह नहीं कि प्रेम के नाम पर उसकी परछाइयां ही नज़र आ रही हैं
भयावह यह है कि हम परछाइयों के साथ जीने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं

ÛÛ

हम लेखक हैं, कवि हैं, कलाकार हैं
यानि अपने वक्त की सटीक पुकार हैं
मगर हमारी कलमों से इधर बहुत ज़्यादा घास पैदा हो रही है
नस्लें बहुत खुश पैदा हो रही हैं   
या फिर बहुत उदास पैदा हो रही हैं


-विमल चन्द्र पाण्डेय
प्लॉट नं0 130-131
मिसिरपुरा, लहरतारा
वाराणसी -221002 (उ0 प्र0)
फोन - 9820813904

ईमेल आईडी – vimalpandey1981@gmail.com